Joke Nahi Hai Bhai – BMJ https://bhaadmeja.com "Dil ki therapy... Lafzon ke sath..... free wali!" Wed, 06 Aug 2025 18:36:33 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.8.3 https://bhaadmeja.com/wp-content/uploads/2025/07/cropped-cropped-Gali_nahi_hai_bhai__yeh_toh_therapy_hai._free_wali-removebg-preview-32x32.png Joke Nahi Hai Bhai – BMJ https://bhaadmeja.com 32 32 Life Badi Hai, Job Toh Sirf Ek Chhota Part https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/life-is-big-job-is-just-a-small-part-of-it/ https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/life-is-big-job-is-just-a-small-part-of-it/#respond Wed, 20 Aug 2025 18:14:20 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=244 कभी सोचता हूं —लगता है जैसे life एक लंबी Calendar बन गई है।

कितनी बार हम अलार्म की आवाज़ से नींद खोलते हैं, टूथब्रश हाथ में होता है लेकिन दिमाग़ में मीटिंग की स्लाइड्स चल रही होती हैं। रात को खाना खाते वक़्त भी Excel की फाइलें ही घूमती हैं दिमाग में। 8 बजे नाश्ता, 9 बजे ऑफिस लॉगिन, 10 बजे बॉस की मीटिंग — और फिर पूरा दिन एक वर्कशॉप की तरह, जिसमें “mental bandwidth” की कोई छुट्टी नहीं होती।

कई बार तो मन करता है कि अगर बॉस पूछे — “How are you?”, तो कह दूं — “जैसे चल रहा है, वैसे ही जी रहे हैं, सर।”

सच्चाई ये है कि नौकरी अब एक जरूरत है, इश्क़ नहीं।

सुबह की नींद इसलिए छोड़ते हैं क्योंकि PF कटता है, ओवरटाइम इसलिए करते हैं क्योंकि EMI आती है, और जब कभी छुट्टी लेनी पड़े, तो एक हल्का सा गिल्ट ट्रिप भी साथ आता है।

फिर भी हम हर दिन खुद को समझाते रहते हैं —
“थोड़ा और adjust कर लो…”
“Promotion आएगा तो अच्छा लगेगा…”
“थोड़ी saving हो जाए, फिर passion को time देंगे…”

लेकिन वो “फिर” कभी exact date पर नहीं आता। ऊपर से लोग भी अब इंसान नहीं, designation देखने लगे हैं —

“बेटा, क्या करते हो?”
— “नौकरी करता हूं, आंटी।”
“सरकारी या प्राइवेट?”
— “फिलहाल contractual हूं।”

(और फिर आता है वो हल्का-सा मुस्कुराहट वाला pause, जैसे कह रहे हों — “कोई बात नहीं बेटा, सबकी किस्मत एक-सी नहीं होती।”) कभी-कभी तो लगता है जैसे जॉब अब एक नई “पहचान” बन चुकी है।

सरकारी = मान-सम्मान
प्राइवेट = ठीक है
Contractual = “अभी कुछ नहीं कर रहे क्या?”

लेकिन सच ये है कि नौकरी सिर्फ category नहीं, एक परिस्थिति है।

कोई सरकारी होकर भी burnout से गुज़र रहा है,
कोई कॉन्ट्रैक्ट पर होते हुए भी सुकून ढूंढ रहा है,
और कुछ लोग तो corporate की दुनिया में खुद को भूल चुके हैं।

और तभी दिल से आवाज़ आती है — “हम किसी भी category में हों, हमारी कोशिशें permanent हैं।” हमें सरकारी मुहर की नहीं, अपने इरादों की ज़रूरत है। आज भी असली ज़िन्दगी उस chai break में बसती है, जहां तुम दोस्त से कहते हो — “थक गया हूं यार…”

असली शांति उस रात में होती है जब काम के बाद कुछ देर खुद से बात करने का वक्त मिलता है। और कभी-कभी, वो random 3am वाला सवाल — “क्या मैं वाकई खुश हूं?” यही तो असली जीवन है —

कोई feedback form नहीं,
कोई performance appraisal नहीं।

बस वो कुछ लम्हे जब हम अपनी pace पर जीते हैं।

Life Badi Hai, Job Toh Sirf Ek Chhota Part

ऑफिस एक tab है ज़िन्दगी की browser में — कभी-कभी बाकी windows भी खोल लो। इसलिए आज अगर Sunday को Monday का डर सता रहा हो — तो थोड़ी देर के लिए “login” को pause कर दो…

और खुद से कहो —

“मैं काम भी करूंगा, लेकिन खुद के लिए जीना नहीं भूलूंगा।” Because – Life Badi Hai, Job Toh Sirf Ek Chhota Part Hai….

क्योंकि आख़िर में याद वो पल रहेंगे जो तुम्हारे थे — न कि ऑफिस की वो फाइलें जिन्हें किसी ने कभी दोबारा खोला भी नहीं।

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Habit: The Dopamine Loop Trap https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/the-dopamine-loop-trap/ https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/the-dopamine-loop-trap/#respond Mon, 28 Jul 2025 12:47:33 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=468 हम समझते थे सबसे बड़ा नशा चाय है… पर असली नशा तो ये है — एक ऐसा invisible नशा जिसे आज की भाषा में ‘social media addiction’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

आजकल हर हाथ में एक मोबाइल है, और हर मोबाइल में छिपा है एक ऐसा नशा जो न दिखता है, न सुनाई देता है… बस लगता है — नाम है डोपामीन (Dopamine)

सुबह उठते ही अलार्म बंद किया, और फिर WhatsApp पर Good Morning की 14 तस्वीरें, Instagram की 37 reels, और फिर YouTube Shorts का गड्ढा – “बस 5 मिनट और” कहते-कहते आधा घंटा निकल गया। क्या आपको भी यही होता है? बधाई हो! आप dopamine के हाइवे पर तेज़ रफ्तार में दौड़ रहे हैं — और ब्रेक तो जैसे है ही नहीं।

डोपामिन कोई प्रोटीन पाउडर नहीं है, ये दिमाग में खुशी का इशारा भेजने वाला रसायन है। जब कोई reel पसंद आती है, जब पोस्ट पर लाइक आते हैं, जब कोई notification टन-टन करता है — तब ये डोपामिन हमारे दिमाग में चुपचाप टपकता है। और हम बोलते हैं, “चलो बस एक और वीडियो देख लेते हैं।”

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये “डोपामिन का नशा” असल में हमें ही खा रहा है?


Likes, Loops & Lost Time

मैंने तो बस टाइम देखने के लिए फोन उठाया था… और तीन घंटे बाद पता चला कि नींद भी गई और आत्मा भी।

पहले हम तय करते थे कि क्या देखना है, अब algorithm बताता है कि हमें क्या देखना चाहिए। Reels, Shorts और Stories — सब एक सुनियोजित डोपामिन इंजीनियरिंग हैं। हर लाइक, हर शेयर, हर swipe एक छोटी-सी डोपामिन की गोली जैसा असर करता है। और हम उस गोली के पीछे-पीछे भागते रहते हैं।

UK की Beeban Kidron नाम की online safety एक्टिविस्ट ने हाल ही में ब्रिटिश सरकार से अपील की कि influencer culture और dopamine loops से भरी social media addiction की दुनिया को detox किया जाए कि इन डोपामिन लूप्स को detox किया जाए। उनका कहना था, “ये कोई nanny-state का मामला नहीं है, ये आज की जरूरत है।” और वो बिल्कुल सही हैं।

5Rights Foundation जैसी संस्थाओं ने बताया कि ये dopamine-triggering features कैसे बनते हैं:

  • लाइक और शेयर की गिनती
  • गायब हो जाने वाली Stories (Snapchat, Instagram)
  • Constant notifications
  • Endless scroll फीचर

इन सबका मकसद होता है — आपको स्क्रीन से जोड़े रखना, चाहे आपकी ज़िंदगी वहीं अटक जाए।

Digital Snacks, Real-Life Starvation

पहले बोरियत का मतलब था — बैठे-बैठे कुछ सोचना, छत देखना, या फिर कोई बचपन की याद आना। अब बोरियत (boredom) आते ही हाथ खुद ही पॉकेट में चला जाता है।

बस एक reel देखनी थी। पर वही एक reel, तीन बनती है, फिर दस… फिर guilt का झटका। वो guilt जो कहता है — “क्यों देख ली इतनी reels यार?” और फिर वही guilt अगली reel में भी आराम से adjust हो जाता है।

अब किताबें boring लगती हैं, walks slow लगती हैं, और conversations बिना emojis के अधूरी लगती हैं। क्योंकि real life में वो swipe वाला thrill नहीं है।


Short Bursts, Long Damage

पहले बोरियत का मतलब था — बैठे-बैठे कुछ सोचना, छत देखना, या फिर कोई बचपन की याद आना। अब बोरियत (boredom) आते ही हाथ खुद ही पॉकेट में चला जाता है।

बस एक reel देखनी थी। पर वही एक reel, तीन बनती है, फिर दस… फिर guilt का झटका। वो guilt जो कहता है — “क्यों देख ली इतनी reels यार?” और फिर वही guilt अगली reel में भी आराम से adjust हो जाता है।

अब किताबें boring लगती हैं, walks slow लगती हैं, और conversations बिना emojis के अधूरी लगती हैं। ये overstimulation हमारी mental health पर असर डाल रही है और ध्यान की क्षमता को भी कम कर रही है। क्योंकि real life में वो swipe वाला thrill नहीं है।

Read Also: Motivation Ya Manipulation ?

Am I Happy or Just Stimulated?

हर बार जब हम कोई reel देखते हैं, या नया content consume करते हैं, हमारा brain dopamine release करता है। ये एक short, sharp pleasure का signal होता है। पर ये pleasure temporary होता है। और दिमाग इतनी बार इस signal का मजा लेता है कि उसका threshold बढ़ जाता है। मतलब पहले जो चीजें खुशी देती थीं — अब उतनी खुशी नहीं देतीं।

पहले दोस्तों से मिलना exciting लगता था, अब लगता है — “फालतू टाइम वेस्ट है, memes भेज देंगे।” क्योंकि हमारा brain अब सिर्फ वही reward चाहता है जो तेज़, flashy और तुरंत मिले।

अब हर 10 मिनट में phone चेक करना normal लगने लगा है। Toilet में भी reels चल रही हैं, और lift में भी earbuds में कुछ न कुछ बज रहा है। दिमाग को अब एक पल भी बिना dopamine नहीं रहना आता।


What is Dopamine
What is Dopamine

असल मे डोपामिन है क्या?


डोपामिन एक रसायन (chemical) है जो हमारे दिमाग में बनता है। इसे न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है, यानी ऐसा केमिकल जो दिमाग के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक संदेश पहुंचाता है। जब भी हम कोई ऐसा काम करते हैं जिससे हमें खुशी मिलती है — जैसे कि हमारा पसंदीदा खाना खाना, कोई तारीफ़ सुनना, सोशल मीडिया पर लाइक्स मिलना, या रील्स देखना — तो हमारा दिमाग डोपामिन रिलीज करता है। ये डोपामिन हमें अच्छा महसूस कराता है और दिमाग को यह सिग्नल देता है कि “ये काम अच्छा था, इसे दोबारा करना चाहिए।”

असल में डोपामिन हमारे मूड, ध्यान और मोटिवेशन को कंट्रोल करता है। लेकिन आजकल की दुनिया में, जहां हर चीज़ एक क्लिक पर मिल जाती है, वहीं डोपामिन भी बिना ज़्यादा मेहनत के मिलने लगा है — बस एक swipe, एक like, एक notification और दिमाग को खुशी का झटका लग जाता है। धीरे-धीरे हम इस ‘झटके’ के आदी हो जाते हैं।

अब होता ये है कि जब हम बार-बार जल्दी और आसान तरीकों से डोपामिन पाने लगते हैं, तो दिमाग को धीरे चलने वाली चीज़ें — जैसे किताब पढ़ना, ध्यान लगाकर काम करना, या बिना फोन के बैठे रहना — बोरिंग लगने लगती हैं। यही होती है डोपामिन की लत या dopamine habit।

डोपामिन खुद में बुरा नहीं है — वो तो ज़रूरी है। लेकिन जब हम हर वक़्त सिर्फ उसी के पीछे भागने लगते हैं, तो हम अपनी असली ज़िंदगी से disconnect हो जाते हैं। खुशी सिर्फ स्क्रोल करने से नहीं मिलती… कभी-कभी रुक कर जीने से भी मिलती है।

डिटॉक्स नहीं, डिसिप्लिन चाहिए

मान लेते हैं कि आपने Instagram, Facebook, TikTok सब uninstall कर दिए। लेकिन दिमाग का जो dopamine loop बना हुआ है, वो तो detox नहीं हुआ ना?

इसलिए ज़रूरत है mindset बदलने की। कुछ आसान उपाय:

  • सभी notifications बंद करें – हर beep पर ध्यान देना जरूरी नहीं।
  • Screen time limit सेट करें – हर फोन में Digital Wellbeing ऑप्शन होता है।
  • Single-tasking अपनाएं – एक समय पर एक काम। Multitasking सिर्फ dopamine trap है।
  • Dopamine fast करें – एक दिन बिना फोन, बिना स्क्रीन। बोरियत लगेगी, लेकिन ज़िंदा महसूस करेंगे।

इस addiction से बाहर निकलने का रास्ता सिर्फ एक है — रील से रियल लाइफ की तरफ लौटना। बाहर निकलिए, लोगों से बात करिए, किताब पढ़िए, चलिए-फिरिए। Dopamine फ्री नहीं है — हर बार जब आप scroll करते हैं, आप अपनी एक और क़ीमती चीज़ खोते हैं: वक़्त और होश।

एक आईना, एक सवाल

“कहीं हम reel के पीछे खुद को तो नहीं खो रहे?”

सोचिए — जब आप आखिरी बार हँसे थे, तब वजह reel थी या कोई असली इंसान?

जब आप खुश हुए थे, क्या वो लाइक की वजह से था या किसी पुराने दोस्त से मिलने की वजह से?

डोपामीन का ये लूप धीरे-धीरे हमें इंसान से मशीन बना रहा है — जो हर वक्त स्क्रीन से reward चाहती है।

UK एक शुरुआत कर चुका है। अब हमें भी ज़रूरत है कि हम बात करें — अपने बच्चों से, अपने दोस्तों से, खुद से।

अब मैं धीरे-धीरे आदतें बदलने की कोशिश कर रहा हूं। सुबह phone उठाने से पहले 5 मिनट बालकनी में बैठता हूं। खाना खाते वक्त phone से दूरी रखता हूं। हफ्ते में एक दिन airplane mode पर जीने की कोशिश करता हूं।

क्योंकि अब समय है — एक pause लेने का। एक detox का। एक “BMJ” कहने का… उन algorithms को, उन reels को, उन likes को — जो हमारी नींद, ध्यान और खुशियाँ चुरा रहे हैं।

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सोच समझकर लेना ये Decision वरना ज़िंदगी बोलेगी- BMJ https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/most-important-decisions-in-life/ https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/most-important-decisions-in-life/#respond Fri, 25 Jul 2025 11:46:18 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=448 ज़िंदगी में हज़ारों फैसले लेने पड़ते हैं। क्या पहनें, क्या खाएं, क्या जाब करे, किसे Instagram पर follow करें, किसे mute करें… लेकिन Most Important Decisions in Life ऐसे होते हैं जो आपकी पूरी लाइफ का direction बदल देते हैं।

What is a life decision?

  • कहां रहोगे? ( Where You Live,)
  • किसके साथ रहोगे? (Who You’re With)
  • और कर क्या रहे हो ज़िंदगी में? (What You’re Doing)

1. कहाँ रहना है – सिर्फ लोकेशन नहीं, पूरा Lifestyle

“घर वहीं होता है जहां Wi-Fi अपने आप connect हो जाता है… लेकिन क्या बस Wi-Fi से ज़िंदगी चलती है?”

जगह मायने नहीं रखती” — ये लाइन सिर्फ़ तब तक सच है जब तक आप दिल्ली की गर्मी में बिना बिजली के बैठे हों। या मुंबई में 35 हज़ार की किराये में पचास स्क्वायर फीट के रूम में छिपकली के साथ roommate बने हों।

कहाँ रहना है, इसका मतलब सिर्फ address नहीं है — इसका मतलब है कि आप रोज़ क्या झेलोगे, किस बात पर गुस्सा आएगा, और आपकी सुबह की शुरुआत कैसे होगी।

🏙 City vs Village – दिल की सुने या EMI की?

गांव की शांति में जहां पक्षियों की चहचहाहट होती है, वहीं शहर में सुबह की शुरुआत horn और “आपका दूध वाला अभी तक नहीं आया” से होती है।
लेकिन शहर कमाने का ज़रिया देता है – वो corporate slavery जिसमें आप Zoom कॉल पे “good morning” बोलते हुए internally रो रहे होते हैं।

🧠 अकेले रहना या joint family?

कई लोग सोचते हैं – “अकेले रहेंगे, आराम रहेगा।” फिर दो दिन में realize होता है कि बर्तन खुद धोने पड़ते हैं और emotional support free नहीं मिलता।
Joint family में खाने की टेंशन नहीं, लेकिन privacy? वो तो पापा के बगल वाले कमरे में कहीं मर गई।

तो फैसला तुम्हारा – तुम कहां खुश हो सकते हो, वो जगह चुनो। वरना जगह चुन लेगी कि तुम कैसे रहोगे।


2. किसके साथ रहना है – रिश्तों की रॉकेट साइंस

“गलत इंसान के साथ सही जगह भी जेल लगती है, और सही इंसान के साथ गलियों में भी जन्नत मिलती है।”

“गलत इंसान के साथ सही जगह भी जेल लगती है, और सही इंसान के साथ गलियों में भी जन्नत मिलती है।”


रिश्ते – सुनने में प्यारा शब्द है, लेकिन इसके अंदर जो chemistry और confusion है, वो CBSE syllabus से भी ज्यादा complex है।

❤ प्यार में पड़ना आसान है, निभाना hardest level है।


शुरुआत में वो लड़का बहुत caring लगता है – Good Morning मैसेज भेजता है।
शादी के बाद वही पूछता है – “अचार कहां रखा है?”
वो लड़की जो कभी आपकी शायरी पर हँसती थी, शादी के बाद कहती है – “अब काम की बात करो।”

सही पार्टनर मिल गया, तो लाइफ की tension आधी हो जाती है। लेकिन गलत इंसान के साथ, रोज़ वही सवाल आता है –
“क्या गलती की थी मैंने?”
और कुछ मामलों में तो literally ये सवाल ज़िंदगी से पूछने का भी मौका नहीं मिलता!

अब देखिए न – “दिल्ली के एक केस में पारिवारिक अनबन और रिश्तों की उलझनों ने घर के माहौल को काफी तनावपूर्ण बना दिया।
मेघालय में तो honeymoon ही horror movie बन गया – एक खबर में शादी के बाद रिश्तों की जटिलता इतनी बढ़ गई कि मामला क्राइम तक पहुंच गया।”
महाराष्ट्र के सांगली में शादी के कुछ हफ्तों में ही झगड़े ने एक खतरनाक मोड़ ले लिया।
हिमाचल के पालमपुर से लेकर सोलन और चंबा तक – जहां-जहां प्यार में domestic fight हुआ, वहाँ पति का direct transfer ऊपर हो गया – किसी को लाठी लगी, किसी को चाकू।
और मेरठ में एक विवादित पारिवारिक मामला सामने आया जिसमें घर की बातें कानून तक पहुंच गईं।
मतलब रिश्ता नहीं था, “घर के अंदर ready-made tomb” चल रहा था।

👪 परिवार – blessing या pressure cooker?

“बिटिया, शर्मा जी का लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी है, रंग थोड़ा सांवला है पर दिल का बहुत अच्छा है।”
फिर वही ‘दिल का अच्छा’ लड़का आपके सपनों का रोड रोलर बन जाता है – ना communication skills, ना emotional intelligence, बस PF और Pension की उम्मीद!

💸 हाँ, पैसा ज़रूरी है – EMI, बच्चों की fees, और grocery app की cart भी खाली नहीं रहती।
लेकिन सिर्फ पैसा होने से relationship stable नहीं होता – वो तो mutual respect, patience और understanding से टिकता है।

रिश्ता कोई Google Meet नहीं जो 40 मिनट बाद disconnect हो जाए अगर subscription नहीं लिया।
यहाँ अगर एक गुस्से में हो, तो दूसरा ठंडा रहे – ऐसा balance चाहिए।
दोनों एक-दूसरे की सुनें, समझें – अगर एक बोले और दूसरा बस ‘ठीक है’ कहकर चुप हो जाए – तो रिश्ता partnership नहीं, instruction manual बन जाता है।”

🤝 Future stability का मतलब है –

  • जहाँ बात-बात पर ताने ना उड़ें।
  • जहाँ लड़ाई हो, लेकिन हल भी निकले।
  • जहाँ प्यार हो, लेकिन ego नहीं।
  • और जहाँ तुम दोनों Team हो – ना कि एक Boss और दूसरा Daily Wage Worker।

इसलिए next time जब कोई रिश्ता फाइनल करने चले – सिर्फ ये मत देखो कि सरकारी नौकरी है या BMW है।
ये देखो कि गुस्सा आने पर वो बात करता है या मारता है।
तुम्हारी बात समझता है या सिर्फ अपनी चलाता है।
और सबसे ज़रूरी – क्या वो तुम्हें इंसान समझता है या investment?

इसलिए पार्टनर का चुनाव… Facebook status से नहीं, future stability से करो। वरना शादी के बाद status change से ज़्यादा कुछ नहीं बदलता।


3. क्या कर रहे हो ज़िंदगी में – पैशन बनाम पेशा

“काम ऐसा हो जो Monday को सुबह उठने पर दुख ना दे। या फिर दुख दे… पर महीने की पहली तारीख को salary भी दे।”

काम सिर्फ पैसे कमाने का ज़रिया नहीं होता – ये आपकी identity बन जाता है।
लेकिन हमारे यहां career का मतलब है – इंजीनियरिंग, डॉक्टर या सरकारी नौकरी।
अगर आपने बोला – “मैं content creation में हूं”, तो आंटी का जवाब आता है – “मतलब बेरोज़गार हो?”

💼 नौकरी vs पैशन – पेट भरो या सपना?

कई लोग अच्छी खासी नौकरी छोड़कर YouTube चैनल खोल लेते हैं, फिर views आने में 6 महीने लगते हैं और depression 6 दिन में।
तो क्या पैशन ना follow करें? बिल्कुल करें… लेकिन EMI का इंतज़ाम भी रखें।

👨‍💻 Corporate Life – PowerPoint में पसीना

Corporate दुनिया में आप Excel की गलियों में खो जाते हो। एक Boss होता है जो आपको micromanage करता है, एक HR होती है जो हर Friday को बोलती है – “Let’s have fun guys!”
पर fun तो तभी आता है जब आप खुद choose करें कि आप क्या करना चाहते हो।

तो अगर आपका काम आपको mentally मार रहा है, तो भाई… BMJ वो नौकरी। ज़िंदगी नई तलाशो।


अब सवाल – ये फैसले कब लेने चाहिए?

“सही वक्त कभी नहीं आता, बस सही guts चाहिए होता है।”

कभी-कभी हमें लगता है कि अभी नहीं, बाद में सोचेंगे। लेकिन truth ये है –
“अगर आप खुद अपने फैसले नहीं लोगे, तो कोई और ले लेगा… और फिर आप बस उनकी consequences झेलोगे।”

और अगर कोई फैसला गलत हो गया तो?

“गलती कोई खराब बात नहीं है – असली गलती है उसे दोहराना।”

गलत जगह रहना, गलत इंसान से प्यार करना, गलत नौकरी पकड़ लेना – ये सब होते हैं। लेकिन उसे झेलते जाना ज़िंदगी बर्बाद करना है।

Change करो। मुश्किल होगा, लोग बातें करेंगे, पर at least आप अपनी कहानी खुद लिखोगे।

क्या ज़िंदगी इतनी आसान है?

बिल्कुल नहीं।

हर दिन choices की बारिश होती है –
कभी नौकरी छोड़ने का मन करता है, कभी रिश्ते खत्म करने का।
कभी लगता है गांव लौट जाएं, कभी लगता है विदेश भाग जाएं।

लेकिन यही तो मज़ा है – ज़िंदगी का thrill!

तो क्या करें?

तीन सवाल खुद से बार-बार पूछो:

  1. मैं कहां रहकर खुद को ज़िंदा महसूस करता हूं?
  2. कौन है जिसकी मौजूदगी में मैं खुद को खोया नहीं, पाया हुआ महसूस करता हूं?
  3. क्या मैं जो कर रहा हूं, उसमें मेरी आत्मा है… या बस टाइमपास?

अगर आप भी जैसे बड़े फैसलों में उलझे हैं, तो सुबह उठते ही 3 पन्नों की “Morning Pages” लिखने की आदत आपको ज़िंदगीभर काम आ सकती है। कोई नियम नहीं—जो मन में आए लिखिए: डर, सपने, गुस्सा, उलझन या बस “मुझे नहीं पता क्या लिखना है” भी चलेगा। इस राइटिंग रिचुअल का मक़सद है आपके अंदर की आवाज़ से कनेक्ट करना। जब आप अपने विचारों को कागज़ पर उतारते हैं, तो आपका दिमाग़ दोनों तरीकों से सोचता है—तर्क से भी और कल्पना से भी। इससे आप अपने डर साफ़-साफ़ देख पाते हैं, कन्फ्यूजन सुलझा पाते हैं, और बिना झिझक सही फैसले ले पाते हैं। अगर डर लग रहा है कि कोई पढ़ न ले, तो लिखा हुआ फाड़ दीजिए—मक़सद ये है कि आप खुद को पूरी ईमानदारी से समझें। रोज़ नहीं कर सकते? कोई बात नहीं, जब भी कोई बड़ा फैसला लेना हो या खुद से जुड़ना हो, कलम उठाइए और बस लिखते जाइए। आप चौंक जाएंगे कि आपके अंदर कितनी clarity पहले से ही मौजूद थी।

अगली बार जब कोई life advice दे ना, तो ये तीन सवाल उनके मुंह पर मार देना।
कहां रहूं, किसके साथ रहूं, और कर क्या रहा हूं – यही मेरी ज़िंदगी का GPS है।

और अगर कभी लगे कि GPS गड़बड़ हो गया है… तो रूट बदलो, मंज़िल नहीं।- Thanks for reading ” 3 Most Important Decisions in Life”.


Disclaimer :

इस लेख में बताए गए उदाहरण केवल सोच को प्रेरित करने के लिए हैं।” “यह लेख किसी भी व्यक्ति, स्थान या घटना के खिलाफ नहीं है।”

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Motivation Ya Manipulation ? https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/motivation-ya-manipulation/ https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/motivation-ya-manipulation/#respond Mon, 21 Jul 2025 18:30:58 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=380 Reels Dekh Dekh kar lagta hai sab Toppers hain, Aur Hum Bas Loginn Kar Rahe Hain………

Motivation Ya Manipulation – आजकल पढ़ाई सिर्फ पढ़ाई नहीं रह गई। ये एक कंटेंट पीस है। मतलब अगर आपने कोई कोर्स कर लिया, किताब पढ़ ली, या नया स्किल सीख लिया, या नौकरी लग गई, तो उसका सबूत जरूरी है — वो भी वीडियो में, अच्छे लाइटिंग में, बैकग्राउंड में मोटिवेशनल म्यूजिक और कैप्शन के साथ:

“I am not special, I am just focused.”

  • एक समय था जब यूनिफॉर्म पहनने वाला चुपचाप अपना फर्ज़ निभाता था। आजकल यूनिफॉर्म पहनकर सबसे पहले कैमरा ऑन होता है।
  • एक और नया ट्रेंड चल रहा है — पढ़ाई करते हुए वीडियो बनाओ, Pomodoro लगाओ, लोफी म्यूज़िक बजाओ, फिर Result आते ही Uniform पहनकर Reels बनाओ और Caption डालो: “From struggler to officer — Never give up!”

और जैसे ही ये वीडियो पोस्ट होती है,लाखों Views, हज़ारों Likes, और कमेंट्स की बाढ़:

🔥 “Bhai tu toh inspiration है!”

💪 “मैं भी तेरे जैसा बनूंगा!”

👨‍🎓 “बस अब Netflix छोड़ दिया मैंने!”

पर इन सब के बीच,कहीं एक viewer बैठा है —जो या तो अभी भी पढ़ाई कर रहा है,कभी पास नहीं हुआ, लेकिन हार भी नहीं मानी। या किसी और नौकरी में है,या शायद कोई exam छोड़ चुका है। या कोई पढ़ाई छोड़कर घर चलाने के लिए Job कर रहा है,कॉल सेंटर, बैंक, या किसी private firm में।उसका भी सपना था, लेकिन घर की EMI पहले थी।

वो सोचता है —

“क्या मैं loser हूं?”

“मेरे जीवन की कोई value है?”

🎥 जब Motivation बेचने का धंधा बन जाए

पहले पढ़ाई, फिर selection, फिर uniform…

और अब content।

जो कभी aspirant थे, वो अब अक्सर ‘motivational content creators’ बन जाते हैं।

“मैंने 4 बजे उठना शुरू किया, तभी पास हुआ!”

“तू थोड़ा disciplined रहना, syllabus constant खाया कर!”

“Phone छोड़ दे, तभी success मिलेगा!”

कोई पूछे — भाई, तू इंसान है या बॉट?

हर Reel का मकसद:

तुम्हारे guilt से उनके Views बढ़ाना।

तुम्हारे Comparison से उनका Channel चलाना।

😞 अब बात उनके बारे में, जो ये सब देखकर खुद को ‘कमतर’ समझते हैं

मान लो कोई लड़का दिन-रात मेहनत कर रहा है SSC की तैयारी में,

या कोई लड़की बैंक की नौकरी में टाइम निकालकर competitive exam दे रही है,

या कोई middle-class family का बच्चा घर चला रहा है और Part-time पढ़ाई भी कर रहा है।

अब वो जब Insta खोलता है, तो हर जगह बस एक ही सीन —

“Success achieved, आप भी कर सकते हैं!”

और अचानक से उसके दिमाग में एक dialog गूंजता है:

“तू क्या कर रहा है ज़िंदगी में?”

और फिर शुरू होता है —

self-doubt, comparison, guilt

ये सारी feelings हमारे mental health को प्रभावित करती हैं — और यह content manipulation की side-effect की तरह भी काम करती हैं।” और सबसे खराब चीज़ — अपने वर्तमान काम से नफरत। क्योंकि अब वो काम cool नहीं लगता।

Read Also: What to Watch? OTT का महासागर viewers को बना रहा है confused!

✋ हर नौकरी की इज़्ज़त करो – हर एक की ज़रूरत है

फौज के जवान जरूरी हैं, लेकिन किसान के बिना खाना कौन देगा?

IAS अफसर प्रशासन चलाता है, लेकिन कूड़ा उठाने वाला शहर साफ करता है।

डॉक्टर जान बचाता है, लेकिन पंखा ठीक करने वाला गर्मी से बचाता है।

तो फिर सिर्फ एक तरह की सफलता क्यों glorify हो रही है?

क्यों बाकी सबको guilt gift किया जा रहा है?

🧠 Real Talk: क्या Success को इतना दिखाना ज़रूरी है?

मेहनत की, पास हुए – बधाई हो।

कोई आपसे जलता नहीं, inspiration लेता है।

Success दिखाना बुरी बात नहीं है,

लेकिन बार-बार “देखो मैं Official बन गया” वाली फील रखने से content एक performance दिखता है — motivation नहीं।”

मतलब भाई, एक बार बता दो —

“मैंने SSC क्रैक कर लिया” “क्या Questions आए थे,” कैसे अपने उनका जवाब दिया”

हम ताली भी बजाएंगे, comment भी करेंगे।

लेकिन हर तीसरे दिन नए cap, नए salute वाले Reels मत डालो —

तू officer बना है, influencer नहीं।

तो बात motivation से निकलकर “देखो मैं कितना बड़ा बन गया” वाली flex में चली जाती है।

और यहीं पर फर्क होता है –

आप अपनी journey शेयर करें — स्ट्रगल, failure, lessons…या फिर आप बस end-result को चमकाते फिरें।

🌱 Success को दिखाना नहीं पड़ता, वो खुद दिख जाती है

सोचिए — एक पेड़ जो फल देता है, क्या वो चिल्ला कर कहता है, “देखो आम लग गए मेरे!”

नहीं।

लोग खुद उसके पास आते हैं। फल लेते हैं, आराम करते हैं, और इज़्ज़त देते हैं।

असली Success वो है, जो आपके काम से दिखे, आपके स्वभाव से झलके, ना कि हर तीसरी Reel से चिपकी हो।

🧩 हर इंसान का संघर्ष अलग, रास्ता अलग, टाइमिंग अलग

एक इंसान 22 में UPSC निकालता है, दूसरा 29 में।

कोई रेलवे में है, कोई बैंक में, कोई खेत में।

हर किसी का रोल जरूरी है।

जो आज Motivation बेच रहा है, वो भी कभी किसी वीडियो को देखकर guilt में गया होगा।

बस फर्क ये है —

उसने उससे कुछ सीखा या उस guilt को अब दूसरों में बेच रहा है? “असली success वो है जो आपके काम से झलके — न कि trending hashtags, views या influencer culture के filters से।”

🧘‍♂️ अगर तुम काम कर रहे हो – चाहे कोई भी – तुम कम नहीं हो

Call center हो या courtroom,

Data entry हो या Defence force —

हर काम की अहमियत है।

तुम्हारे नाम के आगे कोई Officer ना लगे,

पर तुम्हारा नाम किसी के घर का चूल्हा जलाता है — यही असली success है।

🔚 और आख़िर में — एक बात समझ लो:

> “Success वो होती है, जब लोग तुम्हें तुम्हारे काम से पहचानें, ना कि तुम्हारे Reels से।” Hero वही होता है, जो बिना Reel बनाए भी रोज़ अपना काम करता है |

“जो लड़के-लड़कियां अभी भी बिना कैमरा सेट किए, बिना कोई highlight reel पोस्ट किए – वह भी strong हैं। वो daily real-life hustle में हिस्सा ले रहे हैं।” यह attention economy critique में fit करता है।

कहीं भी अपना best दे रहे हैं — तुम भी देश की रीढ़ हो।

🤔 कभी आपको भी ऐसा feel होता है?

मतलब Insta खोलते ही लगता है कि सब ज़िंदगी में कहीं पहुंच गए और हम बस दूध उबाल रहे हैं?

अगर हाँ, तो comment करके बताओ

यह article इसलिए लिखा गया है ताकि हम सब समझें कि social media की social media addiction और comparison क्यों कभी सकारात्मक नहीं बन सकती। अगर कभी लगा कि सब Instagram पर कहीं आगे बढ़ गए हैं और तुम बस filtering कर बैठे हो — तो याद रखना, असली जिंदगी content से बड़ा है।”

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Doctor ne thik bola, lekin mera bank account bimaar ho gaya ! https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/normal-blood-report-funny-article/ https://bhaadmeja.com/joke-nahi-hai-bhai/normal-blood-report-funny-article/#respond Tue, 15 Jul 2025 16:54:25 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=350 सुबह-सुबह लैब से रिपोर्ट आई — सब नॉर्मल।
CBC, LFT, KFT, TSH, Vitamin D, B12… सब कुछ एकदम चकाचक।

अब होना तो ये चाहिए था कि मन को सुकून मिलता, चेहरे पर राहत आती, और दिल से निकलता — “चलो, सब ठीक है।”

लेकिन नहीं।

दिल के किसी कोने से एक हल्की-सी आवाज़ आती है —

“इतना पैसा लगा… और कुछ निकला भी नहीं?”


✍ पेट में गैस, लेकिन शक था कुछ बड़ा

कल रात ज़रा छोले खा लिए थे, ऊपर से कोल्ड कॉफी — पेट थोड़ा भारी लग रहा था।
सुबह उठे, डॉक्टर के पास गए।
डॉक्टर बोले —

“सर, ऐसा लग रहा है गैस या हल्की अपच है।”

लेकिन हमारा भारतीय दिमाग तुरंत गहराई में चला जाता है।

“डॉक्टर साहब, फिर भी एक बार टेस्ट करवा लेते हैं ना? आजकल कुछ कह नहीं सकते…”

डॉक्टर मुस्कराते हुए बोले, “ठीक है, कुछ बेसिक टेस्ट करवा लो।”

टेस्ट के नाम सुनते ही लगता है जैसे कोई मिसाइल लॉन्च हो रही है

CBC, ESR, T3 T4 TSH, Lipid Profile, Kidney Function, Liver Function, Iron Panel, Vitamin B12, Vitamin D3…
कुछ तो नाम ऐसे लगते हैं जैसे Hogwarts में पढ़ाई शुरू हो रही हो।

टेक्नीशियन आया, सुई लगाई — जैसे खून में कोई गहरी साजिश छिपी हो।
फिर शुरू होता है — इंतज़ार


रिपोर्ट का इंतज़ार = जैसे UPSC का रिज़ल्ट

हर 10 मिनट में लैब की वेबसाइट refresh हो रही है।

“अभी तक नहीं आई?”
“Lab वाले सही से कर रहे होंगे ना?”
“ज्यादा देर मतलब कुछ सीरियस तो नहीं?”

घरवाले भी पूछते हैं जैसे कोई इंडिया-पाकिस्तान मैच का स्कोर देख रहे हों —

“क्या आया बेटा? कुछ निकला?”

फिर आती है रिपोर्ट।
और स्क्रीन पर लिखा होता है:

✅ Everything Normal.


और आप वहीं बैठ जाते हैं — चुपचाप, थोड़े निराश

“कुछ नहीं निकला?”
“तो पेट दर्द क्यों हुआ था?”
“बस गैस थी?”
“₹1999 किस बात के दिए?”

हमने टेस्ट इसलिए कराए थे कि कोई बीमारी तो confirm हो — और हम गर्व से कह सकें:

“देखा! मैं सही सोच रहा था!”

लेकिन जब सब नॉर्मल निकला, तो अंदर एक अजीब-सी खामोशी भर जाती है — जैसे कोई सीज़न फिनाले बिना ट्विस्ट के खत्म हो गया हो।


👨‍⚕️ डॉक्टर का भी क्या कसूर?

अगर डॉक्टर ने सिर्फ इतना कहा — “सब ठीक है, आराम करो, पानी पियो” — तो मरीज़ का चेहरा वैसा हो जाता है जैसे insult कर दी गई हो।

“बस इतना ही? दवाई नहीं दोगे?”

डॉक्टर भी चुपचाप मुस्कराते हैं — शायद उन्होंने ऐसा reaction हर रोज देखा हो।

कुछ लोग तो कहते हैं —

“डॉक्टर साब, कोई टेस्ट फिर से करवा लें क्या? शायद कुछ रह गया हो…” 😑


🧠 दिमाग का Default Mode: “कुछ तो गड़बड़ होनी चाहिए”

हमारी सोच ही कुछ ऐसी है —
अगर सब ठीक निकले, तो हम खुद मानने को तैयार नहीं होते।

“टेस्ट गलत हुआ होगा।”
“शायद कुछ छिपा हुआ है।”
“MRI भी करवाते तो अच्छा रहता।”

हमें आदत है थोड़-बहुत medical drama की — ideally lab certified!


📉 Indian Logic 101: Report Normal = पैसा वेस्ट?

कब आपने किसी को ये कहते सुना है:

“रिपोर्ट नॉर्मल आई — बहुत अच्छा लगा।”

हमारे यहां तो अक्सर reactions होते हैं:

  • “थोड़ी deficiency होती तो calcium syrup मिल जाता…”
  • “BP थोड़ा high होता तो 3 महीने की गोली मिलती…”
  • “इतनी फिटनेस भी ठीक नहीं यार! कुछ कमी तो होनी चाहिए थी!”

😂 Health check-up से जुड़े कुछ Legendary Dialogues:

  • “इतना खून निकल गया… कुछ तो कमी होनी चाहिए थी!”
  • “पिछली बार भी सब ठीक था… फिर भी 2 महीने बाद सर्दी हुई थी।”
  • “Neighbor की रिपोर्ट में तो sugar निकली थी… मेरी एकदम साफ?”
  • “अबे रोज़ gym जाते हैं… कुछ तो nutritional कमी हो!”
  • और सबसे महाकाव्य:
    “₹1999 लग गए, कुछ तो निकलता!”

Also Read: When Life Gives You Tangerines” का ऐसा जूस निकला कि आंसू भी मीठे लगने लगे

📢 अब ज़रा रुक के सोचो…

ये सिर्फ ह्यूमर नहीं है — ये एक सोच का आईना है
हमारे लिए हेल्थ की रिपोर्ट “नॉर्मल” आना relief कम और disappointment ज़्यादा बन जाता है।

क्योंकि हमने हेल्थ को prevention की जगह हमेशा reaction की तरह देखा है।
मतलब तब तक टेस्ट कराते हैं जब तक कोई problem दिखे नहीं — और अगर नहीं दिखी, तो लगता है पैसे गए पानी में।

और अगर Vitamin D थोड़ा low निकल आए…

तो खुशी ऐसे मनाते हैं जैसे WhatsApp पर old school दोस्त मिल गया हो:

“Finally! कुछ निकला!”
“अब लगेगा कुछ इलाज होगा।”

अब आपकी बारी है — क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है?

👇 नीचे कॉमेंट करके बताओ:

  • आखिरी बार कब आपने टेस्ट करवाया?
  • कुछ निकला या फिर peace of mind मिला?
  • आपकी सबसे “funny” रिपोर्ट कौन सी थी?

और हां, याद रखो:

यह लेख सिर्फ सामाजिक व्यवहार और health awareness की चर्चा करता है। किसी भी मेडिकल निर्णय के लिए अपने डॉक्टर की सलाह लेना हमेशा ज़रूरी है।

पैसा नहीं गया बर्बाद — Peace of Mind खुद में एक बहुत बड़ी कमाई है।
और अगर रिपोर्ट नॉर्मल आई है — तो खुश रहो, celebrate करो।

क्योंकि असली Jackpot वही है।

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