Dil Se – BMJ https://bhaadmeja.com "Dil ki therapy... Lafzon ke sath..... free wali!" Thu, 04 Sep 2025 14:22:40 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.8.3 https://bhaadmeja.com/wp-content/uploads/2025/07/cropped-cropped-Gali_nahi_hai_bhai__yeh_toh_therapy_hai._free_wali-removebg-preview-32x32.png Dil Se – BMJ https://bhaadmeja.com 32 32 Shaadi ki Sherwani : Groom Ki Nazar Se Expectations vs Reality https://bhaadmeja.com/dil-se/shaadi-ki-sherwani-shadi-ke-baad-kahan-hai-mera-raja/ Thu, 28 Aug 2025 19:11:19 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=893 जब मैं Shaadi ki Sherwani पहनकर दूल्हे की तरह सजा-धजा बारात में निकला था, उस दिन मुझे लग रहा था कि मैं किसी हिंदी फ़िल्म का हीरो हूँ- “Mujhse Shadi Karogi”। चारों तरफ़ लाइटें, बैंड-बाजे, पटाखे और मेरे ऊपर दर्जनों कैमरों की फ़्लैश। दर्पण में खुद को देखा तो ऐसा लगा कि अगर आज पृथ्वी पर बादशाह अकबर और शाहजहाँ दोबारा ज़िंदा हो जाएँ, तो भी मुझसे जलन खाने लगेंगे। इतना रॉयल लुक था मेरा।

बॉलीवुड का बड़ा असर है हमारी शादियों पर। असलियत तो ये है कि जब मैं शेरवानी लेने दुकान पर गया था, तो दुकानदार ने मुझे ऐसा ट्रीट किया जैसे मैं करन जौहर की अगली शादी-थीम वाली फ़िल्म में हीरो बनने जा रहा हूँ।

“भाईसाब, ये Sherwani तो बिल्कुल शाहरुख़ खान – दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे वाली है।”

लेकिन फिर शादी ख़त्म हुई, रिसेप्शन हुआ, मेहमान घर चले गए, और मैं अपनी दुल्हन लेकर घर लौट आया। उस दिन के बाद से मेरी ज़िंदगी में दो चीज़ें बदल गईं – पहला, घर में ‘हमेशा पत्नी का कहना मानना’ वाला नियम लागू हो गया। और दूसरा, वो 30 हज़ार की शेरवानी, जो शादी में मेरी शान बनी थी, सीधा आलमारी में टाँग दी गई और तब से वहीं है। उसके बाद से तो हाल ये है कि जब भी आलमारी खोलता हूँ, तो कोने में टँगी वो शेरवानी मुझे घूर-घूर कर देखती है। कभी लगता है पूछ रही हो – “भाई, मैं अब फिर कब बाहर घूमने जाऊँगी? या मेरी किस्मत यहीं सड़ने में लिखी है?”

भारतीय शादी में शेरवानी पहनना सिर्फ़ एक फैशन स्टेटमेंट नहीं है, बल्कि परंपरा का हिस्सा है। पहले के ज़माने में राजा-महाराजा रेशम, जरी और ब्रोकेड की शेरवानी पहनकर अपनी शाही पहचान दिखाते थे। आज भी नॉर्थ इंडिया की शादियों में दूल्हे की शेरवानी को राजसी गौरव से जोड़ा जाता है। यहाँ तक कि अलग-अलग राज्यों की अपनी-अपनी खासियत है – लखनवी चिकनकारी की शेरवानी, बनारसी सिल्क की शेरवानी, और राजस्थान की भारी एम्ब्रॉइडरी वाली शेरवानी।

हर शादी में दिल में एक ख्वाहिश

अब कोई भी शादी का कार्ड घर आता है, तो सबसे पहले दिमाग में यही सवाल आता है – “क्या इस बार Shaadi ki Sherwani पहन लूँ?” लेकिन फिर सोचता हूँ –

  • अगर कलीग की शादी है, तो सब लोग सूट-बूट में होंगे। मैं अकेला राजा हरिश्चंद्र बन जाऊँगा।
  • अगर दोस्त की शादी है, तो बाकी सब फ्री में मस्ती करेंगे और मैं दूल्हे का फर्जी डुप्लीकेट लगूँगा।
  • अगर किसी कज़िन की शादी है, तो घर वाले बोल देंगे – “भाई, तू अपनी शादी वाला टेंट क्यों पहन रहा है?”
  • मतलब साफ़ है – शादी के बाद आदमी को शेरवानी पहनने का मौक़ा सिर्फ़ dream में मिलता है।

पत्नी की मासूम मगर खतरनाक मुस्कान

सबसे बड़ा दर्द तो तब होता है जब पत्नी आलमारी साफ़ करते हुए हाथ में शेरवानी निकाल लेती है। उसकी नज़रें वैसे होती हैं जैसे CID वाला ACP प्रद्युमन सबूत पकड़ता है। फिर बड़ी मासूमियत से बोलती है –

“इतने पैसे लगाए थे इसमें, और अब धूल खा रही है। तुम्हें तो सूट ही पहनना था।”

अब मैं उसे क्या समझाऊँ? कि शादी से पहले वही तो कह रही थी – “शेरवानी में तुम प्रिंस लगोगे।” और अब वही कह रही है – “क्यों पहनी थी?” मैडम, ये तो वही बात हो गई कि शादी से पहले आदमी बोलता है – “जान, चाँद-तारे तोड़ लाऊँगा।” और शादी के बाद वही आदमी दूध का पैकेट लाने में भी बहाने बनाने लगता है।

Read also:Kya kar rahe ho ? -पत्नी का वो ब्रह्मास्त्र जो कभी खाली नहीं जाता!

दोस्तों के ताने

दोस्तों का मामला और भी खतरनाक है। जब कभी शादी में जाने का मन बनता है और कह देता हूँ कि इस बार शेरवानी पहनूँगा, तो सब मिलकर मज़ाक उड़ाने लगते हैं –
“ओये, फिर से बारात लेके आना क्या? तेरी तो बीवी भी सोचेगी कि ये मेरा दूसरा विवाह कर रहा है।”

कोई बोलता है – “Shaadi ki Sherwani में तू नहीं, बस तेरी EMI दिखती है।”
कोई बोलता है – “भाई, तू शेरवानी पहन ले, पर बारात में दूल्हे की ज़रूरत नहीं है।”

शरीर का सबसे बड़ा धोखा

चलो मान लो, हिम्मत करके शेरवानी निकाल भी ली। अब जब पहनने की कोशिश करता हूँ, तो पता चलता है – शादी के बाद वाली दाल-बाटी, आलू के पराठे, और मटन करी ने ऐसा कमाल किया है कि बटन बंद ही नहीं हो रहे।

पहले जहाँ Shaadi ki Sherwani पहनकर मैं मॉडल लग रहा था, अब वहीं पेट बाहर लटक रहा है। हालत ऐसी हो गई है कि नीचे पजामा फँस रहा है, ऊपर गला घुट रहा है। शेरवानी भी सोचती होगी – “ये मोटा मेरे लिए ही बना था?”

बच्चों की शादी तक संभाल कर रखूँ?

कुछ लोग सलाह देते हैं – “अरे भाई, इसे बच्चों की शादी तक संभाल कर रखो। बेटा बड़ा होगा तो उसके काम आएगी।”
लेकिन मुझे अच्छी तरह पता है – जब तक मेरा बेटा बड़ा होगा, तब तक फैशन बदलकर नए जमाने का होगा। वो कहेगा – “पापा, मुझे तो शादी में ब्लेज़र पहनना है। Sherwani तो uncool है।” मतलब ये भी आइडिया फेल।

रेंट पर देने का खतरनाक सपना-

कभी-कभी सोचता हूँ कि इसे रेंट पर ही दे दूँ। आखिर अब तो ऐसे कई प्लेटफॉर्म आ गए हैं जहाँ शादी की ड्रेस किराए पर मिलती है। लेकिन फिर दिमाग में डर आता है – अगर किसी ने इसमें पान खा के दाग़ डाल दिए तो? या फिर DJ पर नाचते-नाचते सिलाई फट गई तो? मेरी 30 हज़ार की शान हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगी।

रिश्तेदारों का नजरिया-

कभी अगर पहनकर चला भी गया तो रिश्तेदारों का अलग ही ताना
“अरे ये तो वही अपनी शादी वाली शेरवानी पहन आया है। अब समझ नहीं आता – पहनूँ तो दिक़्क़त, न पहनूँ तो पैसा बरबाद।

Read Also: Shaadi Pending… Universe Approving Late !

धोबी की गवाही-

एक बार तो मैंने धोबी को ही दे दी कि ज़रा प्रेस कर दे। उसने हाथ में पकड़ते ही कहा –
“साहब, ये तो बहुत भारी है। इसमें इस्त्री लगाने से तो मुझे भी पसीना आ जाएगा।” मैंने मन ही मन सोचा – “भाई, तू धोबी है, तुझे पसीना आना स्वाभाविक है। लेकिन सोच, मुझे इसमें शादी में नाचना पड़ा था।”

सेल्फी और सोशल मीडिया –

अब सोशल मीडिया ने तो और मुसीबत बढ़ा दी है। अगर कहीं पहन भी लिया और फोटो डाल दी, तो सब पूछेंगे –
“भाई, ये शादी की फोटो दोबारा क्यों डाल रहा है?”
क्योंकि शेरवानी पहनते ही लोग मान लेते हैं कि या तो तुम्हारी शादी हो रही है।

Wedding Prep Tips


“अगर आप भी शादी की तैयारी कर रहे हैं, तो कुछ बातें ध्यान में रखिए –

  • शेरवानी हमेशा अपने body type के हिसाब से सिलवाइए। बहुत ढीली होगी तो आप tent लगेंगे, और बहुत tight हुई तो DJ पर दो गाने के बाद ही दम घुट जाएगा।
  • कलर चुनते वक्त अपनी दुल्हन के आउटफिट का ध्यान रखिए। अगर दुल्हन लाल लहंगा पहन रही है और आप bottle green शेरवानी पहन लेंगे, तो लोग कहेंगे ‘Christmas Couple आ गया’।
  • शादी की शेरवानी भारी होती है, इसलिए आरामदायक जूते लेना ज़रूरी है। वरना सात फेरे तो छोड़िए, बारात में ही घुटनों में दर्द शुरू हो जाएगा।”

अंत में-

आख़िरकार मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि शादी की शेरवानी असल में शादी के दिन की trophy होती है। जैसे क्रिकेटर वर्ल्ड कप उठाकर trophy case में रख देता है और फिर उसे रोज़-रोज़ नहीं घसीटता, वैसे ही शादी की शेरवानी भी trophy बनकर आलमारी में टँगी रहती है। उसकी असली जगह बाहर नहीं, बल्कि यादों में होती है। वो आपकी जिंदगी के कुछ हसीन पलो की यादे है ।

Fashion Advice : आजकल शेरवानी के साथ experiment का ज़माना है। अगर आपको लग रहा है कि शादी के बाद आपकी शेरवानी बेकार हो जाएगी, तो इन फैशन हैक्स को अपनाइए –

  • शेरवानी को अलग-अलग पैंट्स या जीन्स के साथ mix-match कर सकते हैं। हल्के फंक्शन में यह Indo-Western लुक देगा।
  • अगर embroidered शेरवानी है, तो सिर्फ़ jacket-style हिस्सा किसी plain kurta के ऊपर पहन सकते हैं।
  • Accessories जैसे brooch, stole और safa बदलकर आप हर बार नया लुक create कर सकते हैं।
  • और हाँ, अगर बिल्कुल पहनने का मौका नहीं मिल रहा, तो इसे rent पर देकर किसी और की शादी का hero बनने में मदद कर दीजिए – पैसे भी बचेंगे।”

हाँ, मैं कभी-कभी जब बीवी घर पर नहीं होती, तो मैं चोरी-चुपके शेरवानी पहनकर आईने के सामने खड़ा हो जाता हूँ। फिर खुद को देखकर सोचता हूँ – “वाह, उस दिन मैं सच में दूल्हा था।” और पाँच मिनट बाद उतारकर फिर वही जीन्स-टीशर्ट पहन लेता हूँ।

शादीशुदा मर्द की हक़ीक़त – Shaadi ki Sherwani अब कब पहनूँ, समझ ही नहीं आता!

तो अब यही समझ आया है – Shaadi ki Sherwani हमेशा आलमारी में टंगी रहना नहीं चाहिए। कभी-कभी चोरी-चुपके उसे निकालो, पहनकर आईने में देखो, और उस पल को पूरी तरह महसूस करो। जैसे फिर से वही शादी वाला रोमांच और रॉयल फीलिंग लौट आई हो। हाथ में फैब्रिक की नर्मी, कंधों पर बैठी डिजाइन की चमक, और दिल में वही गर्व – बस वही पल है जिसे जी लो। उस समय हर टेंशन, पेट की चिंता, दोस्तों के ताने सब गायब हो जाते हैं। थोड़ी देर के लिए महसूस करो कि तुम फिर से दूल्हा हो, और बस… रिलैक्स हो जाओ।

ज़िंदगी की भागदौड़ में ये छोटा सा पल ही कभी-कभी सबसे बड़ा तोहफ़ा बन जाता है।

]]>
Cheers! जाम टकराने की कहानी https://bhaadmeja.com/dil-se/cheers-kyu-karte-hai/ https://bhaadmeja.com/dil-se/cheers-kyu-karte-hai/#respond Wed, 20 Aug 2025 18:39:30 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=344 Cheers kyu karte hai:-

शादी की रौशनी में चमकती शाम हो, संडे ब्रंच की ढेर सारी मिमोसाओं वाली सुबह, या फिर दोस्तों के साथ बोनफायर के आसपास बैठकर “गर्मियों की ठंडी ड्रिंक्स की चुस्कियाँ।”।
गिलास उठते हैं, आँखों में हल्की सी चमक, कोई चहक के कहता है – “Cheers!”
बाकी सब भी वही बोलते हैं। – Cheers!

हम सब ये कर चुके हैं, बिना सोचे, बार-बार। लेकिन कभी रुके हो ये सोचने के लिए कि आखिर ये “Cheers!” और गिलास टकराने वाला ड्रामा शुरू कहां से हुआ?

मतलब… सीधे गिलास उठाकर पीना ही काफी नहीं?

बात बहुत पुरानी है, और काफ़ी Toast-भरी भी

चलो टाइम मशीन में बैठते हैं और सीधा पहुँचते हैं प्राचीन ग्रीस और रोम। उस दौर में वाइन सिर्फ़ वाइन नहीं थी — देवताओं का प्रसाद थी। हर त्योहार, हर पूजा, हर लड़ाई के बाद जश्न — सबमें वाइन।

लेकिन साथ में आती थी एक भारी डोज़ डर की: ज़हर।

हाँ, सीरियसली। दुश्मनों को मारने के लिए लोग वाइन में ज़हर मिला देते थे।
तो अगर कोई तुम्हें वाइन ऑफर करता था, तो शक जायज़ था।

इसीलिए ग्रीक होस्ट पहले खुद पीते थे — ताकि मेहमान को लगे कि भाई साफ़-सुथरा माल है।
धीरे-धीरे ये इशारा एक रस्म बन गया:
गिलास उठाना = भरोसा जताना।

🥖 Toast मतलब… असली वाला Toast?

अब आते हैं रोमन जनाबों की बात पर।
इन लोगों ने तो गिलास में जली हुई ब्रेड डालनी शुरू कर दी।

क्या? क्यों?

क्योंकि उनकी वाइन बहुत खराब होती थी — खट्टी और कभी-कभी उल्टी के लायक। जली हुई ब्रेड से उसकी एसिडिटी कम होती थी।
तो जब वाइन के गिलास में ब्रेड डुबोने लगे, तभी “raising a toast” वाली लाइन जन्मी।
मतलब अगली बार जब आप “Let’s raise a toast!” बोलें, तो याद रखिए – आप असल में शराब में ब्रेड डुबाने वाले पूर्वजों को याद कर रहे हैं।

cheers kyu karte hai 2

🛡 Medieval Style – जब Clink (Cheers!) का मतलब था: मरेंगे तो साथ मरेंगे

मिडीवल टाइम्स यानी यूरोप की वो कहानी जहाँ सबको लगता था कि हर दूसरा बंदा ज़हर देने वाला है।
तो वहाँ गिलास टकराने का एक अलग लेवल का मतलब था:
इतने ज़ोर से टकराओ कि तेरी ड्रिंक मेरी ड्रिंक में मिल जाए।

अगर ज़हर है, तो अब दोनों में है।
अगर तू पी रहा है, तो मैं भी। भाईचारा लेवल – डाई हार्ड

इस ‘clink’ का मतलब बन गया – भरोसा, वफादारी, और कभी-कभी:
“अगर मरेंगे, तो साथ मरेंगे, Cheers!”

👑 दरबार से डिस्को तक

1600s-1700s आते-आते ये Toasting सिर्फ़ सुरक्षा कवच नहीं रहा – ये बन गया स्टेटस सिंबल।
राजाओं के दरबारों में, अगर आपने Toast नहीं उठाया – तो समझो आपने देशद्रोह कर दिया।

हर Toast के पीछे कुछ ना कुछ भावना होती थी — मोहब्बत, राजनीति, या वो बंदा जो उस दिन पहली बार जैम शॉर्ट्स पहनकर आया था।

ये बन गया एक पब्लिक इमोशनल इंस्टा स्टोरी — Live version, जिसमें सबका “cheers!” देना ज़रूरी था।

Also Read : Happy Friendship day : यारी है तो टेंशन काहे का बे?

🌍 ग्लोबल Clink – एक रस्म, कई भाषाएँ

अब तो दुनियाभर में ये रिवाज़ है:

  • फ्रांस में: Santé
  • इटली में: Salute
  • स्पेन में: Salud
  • जापान में: Kanpai
  • भारत में: सीधा Copy-Paste — “Cheers!”

ये गिलास टकराने की आवाज़ एक ग्लोबल sigh-of-relief बन चुकी है।
भाषा भले बदल जाए, लेकिन उसका मतलब वही है:
हम सब साथ हैं। और आज का दिन मनाने लायक है।

🤔 तो आज भी करते क्यों हैं?

क्योंकि अब ज़हर का डर नहीं है, पर एक दूसरे से जुड़ने की चाह अब भी उतनी ही है।”

क्योंकि एक गिलास की टंकार में छुपी होती है दोस्ती, मस्ती, और ये कहना:

BMJ सारी टेंशन — चलो आज बस जिएँ!”

]]>
https://bhaadmeja.com/dil-se/cheers-kyu-karte-hai/feed/ 0
स्वतंत्रता से लेकर आज तक Desh Bhakti Geet का सफर https://bhaadmeja.com/dil-se/desh-bhakti-geet/ https://bhaadmeja.com/dil-se/desh-bhakti-geet/#respond Tue, 19 Aug 2025 11:05:25 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=756 भारत का इतिहास सिर्फ किताबों और भाषणों में नहीं बसा है, बल्कि गानों की धुनों में भी गूंजता है। “Desh Bhakti Geet” सिर्फ म्यूज़िक नहीं हैं, ये वो जादुई आवाज़ें हैं जो दिल में जोश भर देती हैं, और अक्सर आँखें नम कर देती हैं, और हमें याद दिलाती हैं कि हम किस मिट्टी से बने हैं। 1947 में जब देश आज़ाद हुआ, तभी से लेकर आज 2025 तक, इन गीतों ने हर पीढ़ी को अलग-अलग अंदाज़ में देशभक्ति का स्वाद चखाया है। आइए, चलते हैं एक संगीत यात्रा पर, जिसमें हर दशक की अपनी धुन, अपनी कहानी और अपना असर है।

आज़ादी का पहला सुर – 1947 से 1960 का दौर

आज़ादी के तुरंत बाद का समय वो था जब देश एकजुट था, ज़ख्म ताज़े थे, और उम्मीदें बड़ी। “ऐ मेरे वतन के लोगों” जैसे गाने सिर्फ गाने नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावना के तीर्थ थे। लता मंगेशकर की आवाज़ में जब ये गीत गूंजा, तो पंडित नेहरू की आँखें भी भर आईं। ये वो दौर था जब गाने सीधे दिल पर वार करते थे – बिना म्यूज़िक वीडियो, बिना ऑटोट्यून।

देश निर्माण का समय – 1960 से 1980

ये वो समय था जब देश अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था और युद्धों का सामना कर रहा था। इस दौर के देशभक्ति गीतों में ताकत, बलिदान और एकता का संदेश था। “कर चले हम फ़िदा” जैसे गीतों ने शहीदों के बलिदान को अमर कर दिया। रेडियो और आकाशवाणी से निकलकर ये गाने हर गली-मोहल्ले में गूंजते थे। स्कूल असेंबली में बच्चे पूरे जोश से गाते – सुर कभी सही हों या ना हों, लेकिन भावनाएं हमेशा 100% होती थीं।

ये वो दौर था जब गाने सुनकर लोगों में देश के लिए कुछ करने की आग जल उठती थी।

फ़िल्मी धुनों में देशभक्ति – 1980 से 2000

इस समय तक फिल्मों ने देशभक्ति को नए अंदाज़ में पेश करना शुरू किया। “माँ तुझे सलाम” (ए.आर. रहमान) जैसे गाने आए, जिन्होंने देशभक्ति को पॉप म्यूज़िक के साथ मिला दिया। ये वो दौर था जब देशभक्ति गीत सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि म्यूज़िक चार्ट्स में भी अपनी जगह बनाने लगे।

डिजिटल इंडिया और वाइरल देशभक्ति – 2000 से 2025

अब देशभक्ति गीत सिर्फ एल्बम्स या फिल्मों तक सीमित नहीं हैं। यूट्यूब, इंस्टाग्राम, और रील्स के ज़माने में “तेरी मिट्टी” (केसरी) जैसे गाने वायरल हो जाते हैं और करोड़ों व्यूज़ पाते हैं। नए जमाने के गानों में प्रोडक्शन वैल्यू हाई है, लेकिन दिल छूने वाली भावनाएं अब भी वही पुरानी हैं। फर्क बस इतना है कि पहले हम गाने सुनने के लिए रेडियो का इंतज़ार करते थे, अब बस फोन में प्ले बटन दबाना होता है।

Read Also: Passport Ranking : दुनिया में किसकी उड़ान सबसे लंबी और बिना रुकावट वाली?

देशभक्ति गीत क्यों ज़रूरी हैं?

देशभक्ति गीत एक टाइम मशीन की तरह हैं – जो हमें आज़ादी के संघर्ष, शहीदों के बलिदान और एकता की ताकत की याद दिलाते हैं। ये गाने हमें याद दिलाते हैं कि चाहे टेक्नोलॉजी कितनी भी आगे बढ़ जाए, कुछ चीजें कभी पुरानी नहीं होतीं – जैसे अपने देश के लिए प्यार। Desh Bhakti Geet कभी पुराने नहीं होते। चाहे धुन कितनी भी मॉडर्न हो जाए, लिरिक्स में जब “मिट्टी”, “वतन”, “शहीद”, “झंडा” जैसे शब्द आते हैं, दिल अपने आप खड़ा हो जाता है… और सीना भी।

भारत के दिल को छू लेने वाले कुछ अमर Desh Bhakti Geet

  • ऐ मेरे वतन के लोगों – कवि प्रदीप द्वारा लिखा और लता मंगेशकर द्वारा गाया, 1962 के भारत-चीन युद्ध के शहीदों को समर्पित अमर गीत।
  • वंदे मातरम् – भारत का राष्ट्रीय गीत, मातृभूमि के प्रति सम्मान और प्रेम का प्रतीक।
  • मेरे देश की धरती – देश की सुंदरता, समृद्धि और मेहनतकश किसानों का गुणगान करता गीत।
  • संदेशे आते हैं – फिल्म बॉर्डर का इमोशनल गीत, सैनिकों की याद और बलिदान की कहानी।
  • रंग दे बसंती – स्वतंत्रता सेनानियों की भावना और युवा जोश को दर्शाने वाला जोशीला गीत।
  • ऐ वतन तेरे लिए – देश के लिए प्रेम और त्याग की भावना से भरा गीत।
  • झंडा ऊंचा रहे हमारा – राष्ट्रीय ध्वज की महिमा और स्वतंत्रता का महत्व बताने वाला गीत।
  • सारे जहां से अच्छा – भारत की विशेषता और गौरव का सुंदर वर्णन करने वाला क्लासिक गीत।
  • कर चले हम फिदा – देश के लिए बलिदान देने वाले सैनिकों का भावपूर्ण गीत।
  • देश मेरे देश – देश के प्रति गर्व और सम्मान की भावना को दर्शाता गीत।
  • तेरी मिट्टी – नया लेकिन बेहद लोकप्रिय गीत, मातृभूमि के लिए त्याग और प्रेम को दर्शाता है।
  • मेरा मुल्क मेरा देश – फिल्म दिलजले का गीत, मातृभूमि के गौरव का जश्न मनाता है।
  • ओ देश मेरे – फिल्म भुज का गीत, मातृभूमि की रक्षा और गर्व का प्रतीक।
  • चला (मैं लड़ जाना) – फिल्म उरी का गीत, सैनिकों के साहस और बलिदान की झलक।
  • जय होस्लमडॉग मिलियनेयर का अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गीत, भारत की शान।
  • कन्धों से मिलते हैं कंधे – भारतीय सेना के भाईचारे और एकता का गीत।

अगर चाहो तो इन गानों को सुनते-सुनते आप वाकई में 1947 से 2025 तक का पूरा देशभक्ति सफर महसूस कर सकते हो — बस ध्यान रहे, गाने सुनते वक्त दिल इतना भर जाए कि आंख से आंसू गिरकर मोबाइल स्क्रीन पर न आ जाएं।

]]>
https://bhaadmeja.com/dil-se/desh-bhakti-geet/feed/ 0
Happy Friendship day : यारी है तो टेंशन काहे का बे? https://bhaadmeja.com/dil-se/happy-friendship-day-2025/ https://bhaadmeja.com/dil-se/happy-friendship-day-2025/#respond Sun, 03 Aug 2025 12:39:03 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=614 Friendship का सफर: टिफिन से टॉयलेट तक और टपली से शादी तक

सुबह उठते ही फोन घनघनाया – WhatsApp पर एक फोटो आया जिसमें दो दोस्त पंखा पकड़ के झूल रहे थे और नीचे लिखा था – “Happy Friendship Day, ये वही दोस्त हैं जिनकी वजह से तू आज भी EMI भर रहा है।” दिल से हँसी निकल गई। हँसी भी ऐसी कि छत कांप गई और पड़ोसी पूछ बैठे – “क्या हुआ?” अब उन्हें कैसे बताऊँ कि आज Friendship Day है और मेरी पूरी ज़िंदगी उन्हीं दोस्तों की वजह से इतनी रंगीन रही है – जो कभी बचपन और कॉलेज में मेरे जान से प्यारे थे और आज भी दिल के बहुत करीब हैं – बस अब थोड़े मोटे, थोड़ा शादीशुदा और पहले से भी ज्यादा मस्तमौला हो गए हैं।

बचपन की दोस्ती: मासूम और अनमोल

दोस्ती की शुरुआत कहाँ से होती है पता नहीं, पर मेरे ख्याल से तो वहीं से जब एक बच्चा दूसरे बच्चे से पूछता है – “तेरे पास नया रबड़ है?” और वो मुस्कुरा कर कह देता है – “हाँ, लेकिन तू नहीं ले सकता।” वहीं से शुरू होती है असली यारी – स्कूल साथ जाना, साथ बैठकर एक-दूसरे का खाना खाना, साथ में खेलना, दोस्त के स्कूल न आने पर उसे मिस करना, टपली मारने से लेकर ब्रेक में मां के टिफिन से उसकी पसंद की सब्जी चुराकर देने तक। दोस्त एक शक्तिमान होता था और दूसरा डॉ जैकल।

स्कूल की दोस्ती: टिफिन और ट्यूशन का तड़का

स्कूल के दिन खास होते हैं। मैथ्स की क्लास में पीछे बैठ कर “Love Calculator” चलाना और Chemistry की क्लास में “Bromine” को “Bro ka mine” कहना – यही था हमारा एडवांस एजुकेशन। कोई फॉर्म भरने आता था तो सबसे पहला सवाल – “तेरे पास नीला पेन है?” अगर हाँ, तो दोस्ती पक्की। वरना – “जा बे, तेरी स्याही सूख जाए।”

टीचर जब सवाल पूछते थे, तो दोस्त चुपके से कॉपी खोल कर जवाब दिखाता था। क्लास में बोर होने पर बहाना बना कर दोस्त के साथ टॉयलेट जाना। लंच टाइम में एक दोस्त का टिफिन कभी खुलता ही नहीं था – क्योंकि बाकी सभी दोस्त मिलकर ही उसका टिफिन निपटा देते थे। उस बेचारे को तो अपनी माँ की बनाई मटर पनीर की फोटो ही देखनी पड़ती थी।

एक बार एक दोस्त ने टिफिन में जानबूझकर करेले की सब्ज़ी डाल दी, और जैसे ही हमने मुँह में डाला, वो बोला – “अब खा इसे, मेरी माँ का बदला लिया।”

कॉलेज की दोस्ती: मस्ती और मायने

कॉलेज की दोस्ती एक अलग ही अनुभव है। यहाँ दोस्त ऐसे बनते हैं जैसे चाय के साथ बिस्किट – अलग भी कर दो, तो भी स्वाद नहीं आता। यही वो दौर होता है जब दोस्त एक-दूसरे की अटेंडेंस लगाते हैं, नोट्स शेयर करते हैं और बर्थडे पर केक नहीं, मुँह पर फुल मेकअप करते हैं।

मेरा एक दोस्त था, राकेश – नाम से सीधा, काम से शानदार। हर किसी से ऐसा बात करता था जैसे HR इंटरव्यू ले रहा हो – “आपका नाम बहुत अच्छा है, वैसे आप खुद भी…” और फिर मैं – उसका सच्चा दोस्त, बीच में बोलता – “ये वही है जिसने कल गूगल पर ‘how to impress girls in college’ सर्च किया था।”

एक बार हमने एक नए दोस्त से पूछा – “अंग्रेज़ी में बताओ – ‘मैं बहुत शरीफ लड़का हूँ’।” उसने बोला – “I am virgin minded.” उस दिन से उसका नाम पड़ गया – ‘वर्जिन’।

वो दोस्त जो प्रेम-गुरु बने रहते हैं

ये वो होते हैं जो खुद सिंगल होते हैं, लेकिन दूसरों की लव स्टोरी सेट कराने में एक्सपर्ट बनते हैं। बोलेंगे – “भाई, थोड़ा attitude दिखा, लड़कियाँ पिघलती हैं।” और उसी शाम उन्हें उनकी क्रश ने भाई बोल दिया होता है।

ऐसा दोस्त बोलेगा – “तू बात शुरू कर, मैं पीछे से सपोर्ट करूँगा।” लेकिन खुद कब गायब हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता।

और जब कोई लड़की तुझसे बात करना शुरू करती है, तो तू एक्साइटमेंट में कहता है – “भाई, बात बनने लगी है।” तब वो सधा हुआ जवाब देगा – “ध्यान रखना भाई, लड़कियाँ clever होती हैं।”

और जब बात पक्की हो जाए, तो वही दोस्त बोलेगा – “अबे तू तो बदल गया यार!”

PG लाइफ: दोस्त, रूममेट और परिवार

कॉलेज खत्म होते ही PG लाइफ शुरू होती है, जहाँ दोस्त रूममेट बनते हैं और रूममेट दिल के बेहद करीब। एक बेड, तीन लोग और एक गैस सिलेंडर – यही था हमारा जीवन।

सुबह आवाज़ आती – “दूध गरम कर, नहीं तो चाय नहीं मिलेगी।” नहाने की लाइन, टॉयलेट की लड़ाई, और रात को मैगी को ऐसे देखना जैसे त्योहार का प्रसाद हो – यही थी हमारी लाइफ।

एक दोस्त था – CM, जिसे हर नई वेब सीरीज़ देखकर नई प्रेरणा मिलती थी। “Money Heist” देखकर बोला – “बैंक लूट लें?” मैंने कहा – “पहले लोन चुकता कर ले।”

शादी के बाद: दोस्ती की मीठी यादें

शादी के बाद दोस्ती थोड़ी बदल जाती है। अब बातचीत व्हाट्सऐप ग्रुप तक सीमित रह जाती है – “Good Morning”, “Happy Friendship Day”, “Forwarded as received”। लेकिन जब कभी मिलते हैं तो वही पुरानी बातें, वही मज़ाक – और वही अनमोल यादें ताज़ा हो जाती हैं।

मिलते ही पहला डायलॉग – “कब से पेट बढ़ा रहा है?” दूसरा – “अबे तू तो बाल्ड हो गया है।” और फिर – हँसी जो किसी भी तनाव को मिटा देती है।

एक दोस्त बीवी से झूठ बोलकर मिलने आया – “ऑफिस में मीटिंग है।” तभी पीछे से आवाज़ आई – “भाई, भुजिया ले आ!” फिर अगली सुबह उसकी आंखें सूजी और फोन स्विच ऑफ।

Read Also: Shaadi नहीं हो रही ? Universe की साजिश है भाई !

समय के साथ दोस्त अलग-अलग शहरों में बस जाते हैं, लेकिन दिल से कभी दूर नहीं होते। रात की लंबी बातें अब चैट में बदल जाती हैं।

और एक दिन, सुबह-सुबह मोबाइल पर मैसेज आता है – “अबे, जिंदा है क्या?” बस, उस एक लाइन में सारी पुरानी दोस्ती समा जाती है।

दोस्ती का असली मतलब

दोस्ती वो होती है जिसमें सामने वाला तेरा मज़ाक उड़ाए, लेकिन जब कोई और करे तो तुझे डिफेंड करे। जो तेरे दुःख में बोले – “चल यार, चाय पीते हैं।” और तेरी खुशी में तुझसे ज़्यादा खुश हो जाए।

वो दोस्त जो उधार दे और वापस ना मांगे, क्योंकि उसे पता है – “ये लौटाने वाला नहीं है।” जो तुझसे सिगरेट छुड़वाने के नाम पर खुद दो पी जाए। और तेरी शादी में सबसे ज़्यादा नाचे और बोले – “अबे अब तू गया काम से।”

अंत में बस इतना कहना है…

अगर तेरे पास ऐसा दोस्त है, तो उसे आज कॉल कर के बोल – “भाई, तू ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी है।” और अगर नहीं है, तो आज ही किसी की दोस्ती का हाथ थाम ले – क्योंकि दोस्ती ही है जो हर मुश्किल को आसान बना देती है।

Happy Friendship Day! ❤

अगर किसी शब्द या मज़ाक से आपको असहजता महसूस हुई हो, तो क्षमा चाहता हूँ। मकसद केवल मुस्कान लाना था, किसी भावना को ठेस पहुँचाना नहीं।

]]>
https://bhaadmeja.com/dil-se/happy-friendship-day-2025/feed/ 0
Saiyaara देखने के बाद हर कोई रो क्यों रहा है ! https://bhaadmeja.com/dil-se/saiyaara-people-are-crying-while-watching-saiyaara/ https://bhaadmeja.com/dil-se/saiyaara-people-are-crying-while-watching-saiyaara/#respond Sat, 02 Aug 2025 15:47:19 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=398 पिछले कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है कि देश में National Crying Mission शुरू हो गया है।
“Saiyaara” देखो, भावुक होओ, रिकॉर्ड करो, इंस्टाग्राम पर डालो — और फिर टैग करो:
“This movie broke me 😭💔
लोग सीटियों की जगह सिसकियाँ छोड़ रहे हैं। Popcorn खाने का नहीं, अब tissues रखने का टाइम है।

अब सवाल उठता है – इतना भी क्या था इस फिल्म में कि सब Instagram पर इमोशनल हो रहे हैं?

Saiyaara देख कर लोग भावुक हो रहे हैं,
तो फिर Border देख कर क्या मेडिटेशन में चले गए थे?

People are crying while watching Saiyaara movie
Girl is shocked after watching Saiyaara movie
Girl is crying while watching Saiyaara movie

कहते हैं फिल्म intense है – प्यार, दिल टूटना, अकेलापन, और आत्म-खोज जैसी गूढ़ बातें हैं।
मतलब वही पुराना tried-and-tested formula –
लड़का लड़की से प्यार करता है,
लड़की चली जाती है,
लड़का टूट जाता है,
गाना बजता है…
और audience सोचती है – “This is my story yaar 🥺

People are crying while watching saiyaara movie
Girl is shocked after watching saiyaara movie
Girl is crying while watching saiyaara movie

पर सोचिए, ऐसी तो हर दूसरी फिल्म होती है।
Rockstar, Tamasha, Aashiqui 2, ADHM – सबने दिल तोड़ा, गाना गाया, audience को रुलाया।
तो फिर Saiyara में ऐसा कौन सा अनदेखा तड़का है?

लोग कह रहे हैं कि “lead character बहुत sensitive है”, “emotionally vulnerable है”, “आज की generation जैसा है”।
मतलब अब अगर कोई किरदार रोए, तो वो relatable हो गया?

तो फिर Sunny Deol के crying scenes पर लोग भावुक क्यों नहीं हुए?

अब ये कोई संयोग नहीं है कि हर दूसरी reel में कोई न कोई Saiyaara देखकर emotional दिख रहा है।
कुछ reels में लोग literally theatre में आंसू पोंछते दिख रहे हैं…
कोई पूछे – “भाई तुम मूवी देखने गए थे या इमोशनल वर्कशॉप में?”

और सबसे बड़ा सवाल –

देशभक्ति की फिल्म देखकर कब किसी को ऐसे आंसू आए थे?

Bhagat Singh पर बनी फिल्में देखीं हैं आपने?
Lakshya का वो आखिरी scene याद है?
कभी उन फिल्मों पर भी Instagram story डाली थी?

नहीं।

क्योंकि Saiyaara में दिल टूटता है, और heartbreak आज का aesthetic है।
देशभक्ति में गर्व आता है, पर trending hashtags नहीं।

ये फिल्म अच्छी हो सकती है — पर जिस तरह audience रोने के बाद selfie लेकर कह रही है “this broke me”,
वो असली भावना कम, social performance ज़्यादा लगती है।

और मज़ेदार बात?
कुछ लोग जो पिछले हफ्ते Anant-Radhika की शादी में उदित नारायण के गानों पर झूम रहे थे,
आज वही लोग गा रहे हैं – “Tere bina adhura hoon main…”

इतना तेज़ switch? भाई तुम्हारी feelings की bullet train चल रही है क्या?


Saiyaara movie - crying people
Saiyaara movie – crying people

“Acha rulati hai” — New Compliment?

अब फिल्म की success इस पर नहीं टिकी कि कहानी कितनी दमदार है,
बल्कि इस पर कि audience कितनी बार tissues यूज़ कर रही है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐⭐Emotional Tsunami

सच यही है:
अब heartbreak भी Instagram aesthetic बन गया है।
अब सिर्फ आंसू आना नहीं, आंसू दिखाना ज़रूरी है।

फिल्म ने वाकई आपको रुलाया —
या आपको reel बनानी थी?
इस सवाल का जवाब अब आप खुद ही तय कीजिए।

Read Also”: Papa Kabhi I Love You Nahi Bolte

]]>
https://bhaadmeja.com/dil-se/saiyaara-people-are-crying-while-watching-saiyaara/feed/ 0
आखिर इंसान हम क्यों हैं? https://bhaadmeja.com/dil-se/why-are-we-human/ https://bhaadmeja.com/dil-se/why-are-we-human/#respond Wed, 30 Jul 2025 06:04:47 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=487 आज सुबह चाय पीने के लिए बालकनी में बैठा, तो एक चिड़िया को देखा — अपने लिए घोंसला बनाते हुए। एक-एक तिनका लाकर जोड़ रही थी, हर दिशा से उसे मजबूत बना रही थी। तभी मन में एक सवाल उठा — अगर एक चिड़िया भी अपनी ज़िंदगी में इतनी मेहनत करती है, तो हम इंसान क्या कर रहे हैं? क्या हम सिर्फ काम करने, पैसा कमाने और फिर थककर सोने के लिए बने हैं?

कभी सोचा है कि इंसान और बाकी जीवों में क्या अंतर है? पक्षी भी सुबह दाना चुगने जाते हैं, शाम को अपने घोंसले में लौट आते हैं। न कोई किश्त का तनाव, न प्रमोशन का दबाव। चींटी दिन भर मेहनत करती है, मिलकर एक सिस्टम में रहती है और एक सटीक इंजीनियरिंग से अपना घर बनाती है। ये जीव भी एक अनुशासित जीवन जीते हैं। और हम इंसान? सुबह दफ्तर, रात को घर — बस, एक ‘पैसा’ नाम की उलझन बीच में जुड़ गई है।

हमें खाने के लिए कमाना पड़ता है, कमाने के लिए पढ़ाई करनी पड़ती है, पढ़ाई के लिए कोचिंग करनी पड़ती है, और कोचिंग के लिए फीस भरनी पड़ती है — और ये सब कुछ कभी-कभी असंभव सा लगने लगता है।

हमारी ज़िंदगी एक चक्रव्यूह बन चुकी है — मकसद है पेट भरना, लेकिन रास्ता इतना लंबा हो गया है कि कई बार मन और दिमाग थककर चुप हो जाते हैं।

हमने घर बनाए — आराम के लिए। गाड़ियाँ खरीदीं — सुविधा के लिए। बिज़नेस खड़ा किया — ताकि नाम और पैसा दोनों मिलें। सब कुछ खुद के लिए ही किया — इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन फिर सवाल उठता है —

क्या हम खुद को वाकई में श्रेष्ठ कह सकते हैं?

क्या इंसान बस एक मशीन बन चुका है?

पहले इंसान जंगलों में रहता था, जो मिला खा लिया, और एक-दूसरे का साथ दिया। फिर समाज बना, घर बने, सीमाएं बनीं, और अब हर चीज़ एक रेस बन गई है।

हमने गाड़ियाँ बनाईं, अब ट्रैफिक में फंसे हैं।
मोबाइल बनाया, अब उसमें ही खो गए।
पैसा बनाया, अब उसी के पीछे भागते हैं।

और इस पैसे से हम वही खरीदते हैं — नया मोबाइल, नए कपड़े, नई गाड़ी — बस सब दिखावे और तुलना के लिए। यानी जीवन एक अंतहीन दौड़ बन गया है।

अब सोचिए, अगर सरकार हर महीने हर व्यक्ति को 50,000 रुपये दे — तो क्या 90% लोग फिर भी ऑफिस जाएंगे? शायद नहीं। क्योंकि काम का असली मकसद ‘काम’ नहीं, बल्कि पैसा हो गया है।

इंसान और अन्य जीवों में क्या फर्क है?

हम कहते हैं कि हम “समझदार” हैं। लेकिन जब हम किसी को धर्म, जाति, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर नीचा दिखाते हैं, या ट्रैफिक में गाड़ी काटने पर गुस्सा हो जाते हैं, या किसी गरीब को देखकर नजरें फेर लेते हैं — तो ये समझदारी कहां है?

तो इंसान में खास क्या है?

क्या प्रेम हमें अलग करता है?

कई लोग कहते हैं कि इंसान इसलिए अलग है क्योंकि वो प्रेम करता है। माता-पिता बच्चों के लिए त्याग करते हैं। लेकिन जानवर भी प्रेम करते हैं — एक कुतिया अपने बच्चों के लिए जान की बाजी लगा देती है। गाय अपने बछड़े को स्नेह से चाटती है। पक्षी अंडों के लिए न जाने कितनी मेहनत करता है। पेंगुइन मीलों दूर से खाना लाकर बच्चे को खिलाता है। तो क्या हमारा प्रेम सिर्फ थोड़ा अधिक जटिल है?

यहाँ तक कि आजकल प्रेम में भी तुलना होती है — “देखो शर्मा जी का बेटा IIT चला गया।” विवाह भी अब भावना से ज्यादा एक व्यावसायिक गणना बन गई है।

तो इंसान में असल विशेषता क्या है?

हमने खुद को वर्गों में बाँट दिया है

समाज ने इंसानों को grades में बांट दिया है:

  • A grade — अधिकारी, नेता, नीति निर्धारक
  • B grade — प्रबंधक, योजनाकार
  • C & D grade — कार्यकर्ता, निष्पादक

हर किसी को उसकी नौकरी, वेतन या सोशल मीडिया फॉलोअर्स के आधार पर “value” दी जाती है। और जिनके पास ताकत होती है, वही दूसरों को निर्देशित करते हैं।

चींटियों में भी ऐसा होता है — एक रानी होती है, बाकी कार्यकर्ता।

क्या भाषा हमें अलग बनाती है?

क्या हम केवल इसलिए अलग हैं क्योंकि हम बोल सकते हैं? जानवर भी संवाद करते हैं — बिना टेक्नोलॉजी के। हाथी मीलों दूर तक आवाज़ पहुंचा सकते हैं, मधुमक्खियाँ नाच कर दिशा समझाती हैं, कुत्ता सूंघ कर किसी की भावनाएं जान लेता है।

तो बात सिर्फ भाषा की भी नहीं है।

फिर खासियत कहाँ है?

कभी-कभी लगता है कि हम आज के समय में विशालता में नहीं, बल्कि जटिलता में उलझे हुए हैं। भीम जैसे योद्धा अगर आज होते, तो शायद जिम में जाकर वेट उठाने के बजाय उसे चबाकर खा जाते! हम थोड़े तेज चल लें, तो हमारी घड़ी हमें बधाई देती है।

कभी-कभी सोचो कि अगर कोई माइक्रोस्कोपिक जीव हमें देखे — जैसे हम कॉकरोच से डरते हैं — तो शायद वो भी हमें देखकर सोचते होंगे, “इंसान sneeze कर दे, तो हमारी पूरी कॉलोनी उड़ जाती है।” हम किसी भी अन्य प्रजाति के लिए रहस्यमय और शायद डरावने होंगे।

तो फिर क्या हमें खास बनाता है?

शायद हमारी सोचने की क्षमता और विकल्प चुनने की स्वतंत्रता।

हम आत्मचिंतन कर सकते हैं।
हम खुद से सवाल कर सकते हैं — “मैं क्या कर रहा हूँ? और क्यों कर रहा हूँ?”

तो सही काम क्या है?

अगर आपकी मेहनत सिर्फ वेतन तक सीमित है, और उसका समाज पर कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ता, तो आप खुद को सफल कैसे मानेंगे?

सही काम वही है जो आपके न होने के बाद भी किसी के काम आता रहे।

  • आप डॉक्टर हैं — आपकी बनाई व्यवस्था लोगों का इलाज करती रहेगी।
  • आप पुलिस में हैं — आपका बनाया सिस्टम कानून का पालन कराता रहेगा।
  • आप शिक्षक हैं — आपके पढ़ाए छात्र समाज को बेहतर बनाएँगे।

लेकिन अगर आपका काम ऐसा है कि आप न रहें तो कोई और आपकी जगह ले ले और फर्क न पड़े — तो क्या आपकी मेहनत किसी जीवन में बदलाव ला पाई?

काम का असली मतलब — मकसद बनाम मुनाफा

आज की दुनिया दो हिस्सों में बँटी है:

  1. Purpose-driven jobs — जहाँ मकसद किसी की मदद करना होता है
  2. Profit-driven jobs — जहाँ उद्देश्य सिर्फ लक्ष्यों को पूरा करना और कमाई करना होता है

पहली कैटेगरी मानवता को आगे बढ़ाती है। दूसरी में इंसान एक replaceable part बन जाता है।

तो क्या सब व्यर्थ है?

नहीं। हर काम ज़रूरी है — अगर उसमें इंसानियत जुड़ी हो। फर्क सिर्फ इतना है:

  • कुछ काम Legacy छोड़ते हैं
  • कुछ काम Salary

आप कौन सा बनना चाहते हैं?

निष्कर्ष: “हम इंसान क्यों हैं?”

शायद इसलिए ताकि हम चुन सकें — कि हम किस तरह जीना चाहते हैं।

अगर हमारा काम किसी की ज़िंदगी में सकारात्मक असर डालता है, तो शायद वही असली इंसानियत है। वरना हम भी उसी चक्र में हैं जैसे चींटियाँ — सुबह निकलना, दाना लाना, वापस आना।

बाकी सब — धर्म, राष्ट्र, जॉब टाइटल, सैलरी स्लिप — ये सब हमने खुद ही बनाया है। प्रकृति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

जब बारिश होती है, तो झोपड़ी और बंगला दोनों भीगते हैं।

हमारे पास सोचने की शक्ति है। लेकिन अगर हम सिर्फ अपने पेट और पैसे के लिए ही सोचते हैं, तो फिर वाकई में फर्क क्या है हममें और बाकी जीवों में?

इंसान वही है —

जो अपने साथ दूसरों के लिए भी जिए,
और जाने के बाद भी कुछ ऐसा छोड़ जाए
जो दूसरों के काम आ सके।

काम करो, मेहनत करो, लेकिन ये ज़रूर समझो कि क्यों कर रहे हो।

याद रखो —

  • अगर आपकी मेहनत किसी की जान बचा सकती है — तो वो नौकरी मूल्यवान है।
  • अगर आपकी ड्यूटी किसी की सुरक्षा बन सकती है — तो वो ज़िम्मेदारी अहम है।
  • अगर आपके शब्द किसी को जीने की उम्मीद दे सकते हैं — तो आपकी कलम जीवंत है।
  • अगर आपकी बनाई सड़क पर कोई बच्चा स्कूल जा सके — तो आप कुछ बड़ा बना रहे हैं।
  • अगर आपकी पढ़ाई किसी और की सोच बदल सके — तो आपकी किताबें अमूल्य हैं।
  • अगर आपकी आवाज़ किसी को लड़ने की ताकत दे सके — तो वो आवाज़ परिवर्तन ला सकती है।
  • अगर आपकी मुस्कान किसी डरे हुए चेहरे पर उम्मीद ला दे — तो आप सच्चे नेता हैं।

आप इंसान हैं — इसका मतलब है, आप बदलाव ला सकते हैं। बस सोचिए, चुनिए, और करिए।

]]>
https://bhaadmeja.com/dil-se/why-are-we-human/feed/ 0
Papa Kabhi I Love You Nahi Bolte https://bhaadmeja.com/dil-se/papa-kabhi-i-love-you-nahi-bolte/ https://bhaadmeja.com/dil-se/papa-kabhi-i-love-you-nahi-bolte/#respond Wed, 23 Jul 2025 08:50:40 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=426 “मम्मी से तो दिन में चार बार सुन लेते हैं — बेटा खाना खा लो, बेटा थक गया होगा, बेटा मैं हूँ न। पर पापा? वो बस चुपचाप ऑफिस से लौटते हैं, थैला एक कोने में रखते हैं और पूछते हैं — ‘खाना खाया?’ बस। वही था उनका ‘I love you’।”

बचपन से लेकर जवानी तक, हम पापा से प्यार की भाषा नहीं, जिम्मेदारियों की भाषा में बात करते आए हैं। और इस चुपचाप प्यार की भाषा को समझने में हमें सालों लग जाते हैं।


पापा: वो जो ATM नहीं, इमोशनली मिस्टर इंडिया हैं

पापा घर में एक अदृश्य सिस्टम की तरह होते हैं। जो दिखते कम हैं, मगर हर जगह होते हैं। आपके स्कूल की फीस से लेकर आपकी पहली बाइक तक, आपकी हॉस्टल की सुविधा से लेकर शादी के खर्च तक — वो हर जगह quietly operate करते हैं। पर कहते कुछ नहीं।

वो आपको सामने बैठाकर I love you तो नहीं बोलेंगे, लेकिन ठंड में बिना कुछ कहे आपकी चप्पल बदल देंगे ताकि पैर ठंडे न हो। आपसे बात कम करेंगे लेकिन रात 2 बजे तक तब जागते रहेंगे जब तक आप पार्टी से वापस न आ जाओ। उनके प्यार में कोई शोर नहीं होता — सिर्फ साइलेंस होता है, जिसमें सबसे ज़्यादा केयर छिपी होती है।


Emotional नहीं, Practical Superhero

हमने मम्मी को हमेशा रोते देखा — कभी सीरियल देखते हुए, कभी हमारी Report Card देखकर, कभी पापा से लड़ते हुए। पर पापा? उन्हें हम सिर्फ गुस्से में देखते हैं या चुप्पी में।

क्यों?

क्योंकि पापा की दुनिया में ‘जिम्मेदारी’ पहला धर्म होता है। उनके पास इमोशन्स का टाइम नहीं होता। वो घर चलाते हैं, परिवार को संभालते हैं, और खुद को कहीं दबा देते हैं। पर इसका मतलब ये नहीं कि वो इमोशनल नहीं होते — बस वो ‘express’ करना नहीं जानते।


याद है वो पुरानी साइकिल?

वो जो स्कूल टाइम में मिली थी। हम सोच रहे थे दोस्तों की तरह Hero cycle मिल जाएगी — गियर वाली, स्टाइलिश। पर पापा लेकर आए नीली रंग की बिना गियर वाली cycle।

हमने मुंह बनाया, शायद थोड़ा गुस्सा भी किया। पर क्या कभी सोचा, उन्होंने कितनी बार अपने खर्च काटे होंगे? शायद उन्होंने अपने नए चश्मे टाल दिए होंगे, शायद ऑफिस की कैंटीन की चाय छोड़ दी होगी। उनकी वो चुपचाप दी गई cycle भी एक ‘I love you’ ही था — practical वाला।


पापा की चुप्पी में भरा होता है प्यार

पापा कभी वीडियो कॉल पर “मिस कर रहा हूं बेटा” नहीं कहेंगे।

वो बस पूछेंगे — “खा लिया? पैसों की जरूरत है?”

हम कहेंगे, “सब ठीक है पापा,” और वो बिना ज़्यादा सवाल किए कॉल काट देंगे।

पर अगले दिन UPI में ₹5,000 ट्रांसफर दिख जाएगा।

यही होता है उनका “ख्याल रखना”।

कभी पैसों के पीछे मत देखो — उसमें वो आपकी चिंता, केयर और अदृश्य प्यार डाल कर भेजते हैं।


वो आपका नाम नहीं पुकारते, बस जिम्मेदारी से पुकारते हैं

मम्मी कहती हैं, “राजू, चल बेटा खाना खा ले।”

पापा कहते हैं — “अरे बुलाओ उसे, टाइम पर नहीं खाता है।”

मम्मी गले लगाती हैं।

पापा बस दूर से पूछते हैं — “ऑफिस कब जाना है?”

उनके सवालों में भी प्यार होता है, बस अंदाज़ अलग होता है।


Emotional बाप का डर

हमें तो डर है कि कहीं पापा रो न दें। क्योंकि अगर वो रोए — तो हमारी दुनिया हिल जाएगी।

क्योंकि पापा का इमोशनल होना हमें मजबूर कर देता है उनकी हर चुप्पी को फिर से सुनने, समझने और उनसे माफ़ी माँगने को।

पर क्या हम कभी जाकर उनसे बोले हैं — “I love you, papa”?

हम क्यों नहीं बोलते?

एक कहावत है- माँ 4 रोटी देती है तब 2 गिनती है और बाप 4 जूता मारता है तब 1 गिनता है!

माँ की ममता हमें हर उस चीज़ में दिख जाती है जिसमें ज़रा सा भी “घी” टपकता है और हर उस बात में जो कहती है – “बेटा खा ले, तू तो दिन भर भूखा रहा होगा।” वहीं बापू जी का प्यार थोड़ा अलग packaging में आता है — कम बोलते हैं, ज़्यादा मारते हैं… लेकिन प्यार वही होता है जनाब, बस expression थोड़ा “लात वाला” होता है। जूते तो सिर्फ माध्यम हैं, असली message होता है —

“तू इंसान बन जा बेटा, वर्ना मैं बना दूँगा।”


Generational Gap या Emotional Gap?

हमारी जनरेशन “Reels” में प्यार दिखाना जानती है — “I miss you Mom” वाले filters से, और “Dad my superhero” वाले captions से।पर क्या हमने कभी उनके सामने बैठकर कहा है —

“आपने जो sacrifice किया, उसके लिए थैंक्यू”?

शायद नहीं।

क्योंकि पापा से आंख मिलाकर बात करना भी मुश्किल लगता है। पर अब समय आ गया है कि हम भी ये Gap थोड़ा bridge करें। अब अगर पापा ऑफिस से देर से आएं, तो उनके सामने बैठो, चाय दो, पूछो — “आपका दिन कैसा था?” और एक बार बस धीरे से कह दो — “आप सबसे अच्छे पापा हो।” शायद वो कुछ न कहें। शायद आंखें झुका लें। शायद हल्की मुस्कान दे दें। पर अंदर वो एक छोटा सा बच्चा होगा जो कहेगा — “Finally! किसी ने समझा।”


आखिर में…

पापा वो होते हैं जो कभी “I love you” नहीं बोलते, क्योंकि वो हर दिन उसे साबित करते हैं।

वो जो चप्पल में चलकर हमारी स्कूल फीस भरते हैं।

वो जो खुद की शर्ट रिपीट करते हैं, लेकिन हमें नए कपड़े दिलाते हैं।

वो जो हर रात बेडरूम के पंखे के नीचे नहीं, ड्राइंग रूम की कुर्सी पर सोते हैं, ताकि लाइट न जले और बिजली का बिल कम आए।

तो अगली बार जब कोई कहे — “तेरे पापा तो ज्यादा कुछ बोलते नहीं” — तो बस मुस्कुरा देना, और कहना — “उनके बोलने की ज़रूरत ही नहीं, उनका प्यार हर चीज़ में दिखता है।”

]]>
https://bhaadmeja.com/dil-se/papa-kabhi-i-love-you-nahi-bolte/feed/ 0
Asli Amiri Ka Formula : FOMO, Social Media aur Apni Khushi https://bhaadmeja.com/dil-se/why-become-rich/ https://bhaadmeja.com/dil-se/why-become-rich/#respond Fri, 04 Jul 2025 13:00:23 +0000 https://bhaadmeja.com/?p=191 अमीर बनने का सपना सब देखते हैं। और क्यों न देखें? सोशल मीडिया पर जब तक लक्ज़री कारें, इंटरनेशनल ट्रिप्स और घर से जिम जैसी तस्वीरें और वीडियोज़ दिखते रहेंगे, तब तक हर कोई सोचेगा — “मुझे भी करोड़पति बनना है।”

पर असली सवाल यह है —
क्या हर कोई अमीर है?
या फिर यह बस एक ऐसी दौड़ है, जिसमें सब भाग रहे हैं लेकिन मंज़िल का कोई पक्का नक्शा नहीं है।

इन्फ्लुएंसर लाइफ़स्टाइल का सच

आजकल कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एक जैसा पैटर्न अपनाते हैं —

  1. अपनी पुरानी कठिनाइयों की फोटो दिखाना।
  2. फिर किसी महंगी कार या खूबसूरत लोकेशन के सामने खड़े होकर कहना — “मैंने मेहनत से अपनी ज़िंदगी बदली।”
  3. उसके बाद कोई महंगा ऑनलाइन कोर्स ऑफर करना — “आप भी मेरी तरह सफलता पाएं।”

असलियत में, उस कोर्स से ज़्यादातर कमाई उसी इन्फ्लुएंसर को होती है, न कि हर खरीदार को।

“गरीब vs अमीर माइंडसेट” वाली बहस

अक्सर ये बातें सुनाई देती हैं —

  • गरीब माइंडसेट वाले सिर्फ़ आराम करते हैं।
  • अमीर माइंडसेट वाले सुबह जल्दी उठकर मेहनत करते हैं।

लेकिन सच्चाई ये है कि कभी-कभी वही लोग, जो मेहनत और ‘नो-हॉलिडे’ की सलाह देते हैं, खुद छुट्टियों में विदेश घूम रहे होते हैं।

लक्ज़री दिखाने की रेस

हर दूसरी पोस्ट में महंगी घड़ी, बिज़नेस क्लास सीट और कैप्शन में “Hard work pays off” लिखा होता है।
लेकिन यह हिस्सा अक्सर नहीं बताया जाता कि सफलता के रास्ते में क्या-क्या बलिदान और निजी चुनौतियाँ आईं।

FOMO का खेल

सोशल मीडिया पर ये लाइनें आम हैं —

  • “आज मेहनत नहीं की तो कल पछताओगे।”
  • “दोस्त बड़ी गाड़ी में होंगे, तुम पीछे रह जाओगे।”

हकीकत ये है कि सफलता की परिभाषा हर किसी के लिए अलग होती है, और तुलना करने से ज़्यादा ज़रूरी है अपनी असली ज़रूरतों को पहचानना।

सपनों और हकीकत के बीच

हर किसी को लगता है कि अचानक किसी मौके से करोड़ों मिल सकते हैं।
लेकिन असली जीत उन्हीं को मिलती है जो लगातार सही फैसले और मेहनत करते हैं — न कि सिर्फ़ सपनों में उम्मीद रखते हैं।

क्यों अमीर बनना चाहते हैं लोग?

  • ताकि ज़िंदगी में आर्थिक सुरक्षा हो।
  • ताकि अपनी पसंद का जीवन जिया जा सके।
  • ताकि सपनों को बिना रुकावट पूरा किया जा सके।

लेकिन ये भी सच है कि पैसे के साथ-साथ मानसिक शांति और समय भी उतने ही ज़रूरी हैं।

Amiri Ka Formula क्या है?

सोचो — अगर तुम्हारे पास करोड़ों हों, पर नींद नहीं आती, तनाव है, और family time नहीं है, तो असली अमीरी क्या?

असल अमीरी ये है:

  • तनाव-मुक्त नींद लेना।
  • परिवार और दोस्तों के साथ quality time बिताना।
  • बिना कर्ज़ के जीवन जीना।
  • अपने दिन को अपने हिसाब से जीना।

अगर ये सब कर सकते हो, तो आप पहले से ही अमीर हो, चाहे बैंक balance कुछ भी कहे।

Life Lessons

  • Self-awareness बढ़ाओ – अपने priorities समझो।
  • Emotional peace – पैसे से ज़्यादा जरूरी है mental health।
  • Time management – अपने और loved ones के लिए समय निकालो।
  • Appreciate small joys – छोटी-छोटी खुशियाँ सबसे बड़ी wealth हैं।
  • Social media detox – दिखावे से दूर रहो, खुद को compare मत करो।

BMJ थॉट्स™

  • “पैसा ज़रूरी है, लेकिन इतना भी नहीं कि आप खुद को भूल जाएं।”
  • “असली अमीरी, मन का सुकून और स्वस्थ जीवन है।”
  • “पैसे कमाइए, लेकिन रिश्तों और अपने लिए समय भी बचाइए।”

फ़ाइनल मैसेज:
सोशल मीडिया के शोर को थोड़ा कम करें।
अगर कोई कहे — “अमीर बनो”, तो अपने अंदर से आवाज़ आने दें —

“आज मैं अपने सुकून और चाय के कप में अमीर हूँ।”

ज़िंदगी सिर्फ़ दिखाने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए है।
और कभी-कभी, कम में ही सबसे ज़्यादा खुशी होती है।

Read Also:
]]>
https://bhaadmeja.com/dil-se/why-become-rich/feed/ 0